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Viral खबरें 30 May 2026• 04:28 PM

Amul के फॉर्मूले से सुधरेगी देश की मिट्टी! जानिए क्या है ‘Brown Revolution 2.0' और क्यों है इसकी ज़रूरत

भारतीय मिट्टी की घटती उर्वरता को बहाल करने के लिए वैज्ञानिकों ने 'ब्राउन रिवोल्यूशन 2.0' का प्रस्ताव दिया है। जानिए कैसे अमूल मॉडल से बदलेगी देश की खेती।

Kavita Kelkar

30 May 2026

Amul के फॉर्मूले से सुधरेगी देश की मिट्टी! जानिए क्या है ‘Brown Revolution 2.0' और क्यों है इसकी ज़रूरत

भारत में दशकों से रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग और सघन खेती के कारण खेतों की मिट्टी बंजर होने की कगार पर पहुंच गई है। मिट्टी में जैविक कार्बन (organic carbon) लगातार कम हो रहा है, जिससे इसकी प्राकृतिक उपजाऊ क्षमता प्रभावित हुई है। इस गंभीर संकट से निपटने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने एक क्रांतिकारी राष्ट्रीय आंदोलन—‘ब्राउन रिवोल्यूशन 2.0’ (भूरी क्रांति 2.0) का प्रस्ताव दिया है।

यह विचार डेयरी क्षेत्र में अमूल (Amul) की ऐतिहासिक सफलता की तर्ज पर तैयार किया गया है। इसके तहत ग्रामीण स्तर पर कृषि कचरे को मिट्टी को समृद्ध करने वाले जैविक उत्पादों में बदलने के लिए एक विकेंद्रीकृत सहकारी मॉडल का सुझाव दिया गया है।


घटती मिट्टी की उर्वरता और कृषि कचरे का दोहरा संकट

वैज्ञानिकों के अनुसार, देश के बड़े हिस्से में मिट्टी में जैविक पदार्थों का स्तर न्यूनतम सीमा से नीचे चला गया है (NAAS स्ट्रैटेजी पेपर, 2025)। इसके पीछे एक तरफ मिट्टी की घटती उर्वरता है, तो दूसरी तरफ हर साल पैदा होने वाले कृषि कचरे का कुप्रबंधन है।

  • विशाल कचरा उत्पादन: भारत में हर साल फसलों, बागवानी, तिलहन, पशुपालन और मत्स्य पालन से लगभग 35 करोड़ से 99 करोड़ टन कृषि अपशिष्ट और पराली पैदा होती है।

  • वैज्ञानिक रीसाइक्लिंग की कमी: इस कचरे का 20% से भी कम हिस्सा वैज्ञानिक रूप से रीसायकल किया जाता है। बाकी हिस्से को खुले में जला दिया जाता है या फेंक दिया जाता है।

  • पर्यावरण को गंभीर नुकसान: पराली जलाने से भारी मात्रा में पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5), कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड जैसी जहरीली गैसें हवा में घुलती हैं। इसके अलावा, खेतों से बहने वाला कचरा जलस्रोतों को भी प्रदूषित (eutrophication) करता है।


अमूल के सहकारी मॉडल पर काम करेगी ‘भूरी क्रांति 2.0’

पहली भूरी क्रांति (Brown Revolution 1.0) की शुरुआत हीरालाल चौधरी ने विशाखापत्तनम के आदिवासी क्षेत्रों में चमड़े और कॉफी उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए की थी। लेकिन ‘ब्राउन रिवोल्यूशन 2.0’ का पूरा ध्यान भारत की मिट्टी की सेहत सुधारने पर केंद्रित है।

इस मॉडल के तहत गांवों में सहकारी समितियां या किसान उत्पादक संगठन (FPOs) बनाए जाएंगे। ये समितियां स्थानीय स्तर पर कृषि कचरे को इकट्ठा करेंगी और उन्हें वैज्ञानिक तरीकों से निम्नलिखित मूल्यवान उत्पादों में बदलेंगी:

  1. जैविक कम्पोस्ट (Organic Compost): मिट्टी की संरचना और जल धारण क्षमता को बेहतर बनाने के लिए।

  2. वर्मीकम्पोस्ट (Vermicompost): मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ाने के लिए।

  3. बायोचार (Biochar): मिट्टी में कार्बन को लंबे समय तक लॉक रखने के लिए।

इस पूरी व्यवस्था में आधुनिक तकनीक का भी समावेश होगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) आधारित सेंसर्स के जरिए मिट्टी की सेहत की रियल-टाइम ट्रैकिंग की जाएगी। साथ ही, कार्बन क्रेडिट सिस्टम के माध्यम से मिट्टी में कार्बन स्टोर करने वाले किसानों को अतिरिक्त आय का साधन भी मिलेगा।


सरकार से की गईं बड़ी नीतिगत सिफारिशें

इस क्रांतिकारी अभियान को जमीन पर उतारने के लिए वैज्ञानिकों ने सरकार के सामने एक मजबूत नीतिगत ढांचा रखने का सुझाव दिया है:

  • हर जिले में क्लस्टर: देश के प्रत्येक कृषि जिले में सहकारी आधारित कृषि कचरा संग्रहण और प्रसंस्करण क्लस्टर बनाने के लिए अनिवार्य फंडिंग दी जाए।

  • MSP की तर्ज पर आर्थिक प्रोत्साहन: कलेक्ट और प्रोसेस किए गए बायोमास के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) जैसी वित्तीय सहायता दी जाए ताकि किसान कचरा जलाने के बजाय उसे बेचने के लिए प्रोत्साहित हों।

  • सब्सिडी और ट्रेनिंग: विकेंद्रीकृत कंपोस्टिंग और बायोचार इकाइयों पर सब्सिडी दी जाए और इनका प्रबंधन कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) के साथ जोड़ा जाए।

  • प्रतिबंधों का सख्ती से पालन: फसल अवशेषों को खुले में जलाने पर पूरी तरह से रोक लगाई जाए, लेकिन साथ ही किसानों को इसके व्यावहारिक और किफायती विकल्प भी उपलब्ध कराए जाएं।


किसानों पर प्रभाव

  • कम लागत में ज्यादा मुनाफा: इस मॉडल से किसानों की महंगे रासायनिक खादों पर निर्भरता कम होगी। मिट्टी की जल और पोषक तत्व सोखने की क्षमता बढ़ेगी, जिससे फसलों की पैदावार में सुधार होगा।

  • ग्रामीण रोजगार के नए अवसर: कचरा संग्रहण, प्रोसेसिंग, लॉजिस्टिक्स और तकनीकी देखरेख के क्षेत्र में ग्रामीण युवाओं के लिए लाखों नए रोजगार पैदा होंगे।

  • बेहतर स्वास्थ्य और पर्यावरण: पराली जलाने की घटनाओं में कमी आने से वायु प्रदूषण और फेफड़ों की बीमारियों से मुक्ति मिलेगी।

‘ब्राउन रिवोल्यूशन 2.0’ केवल एक कृषि नीति नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए खाद्य सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन से लड़ने का एक मजबूत वैज्ञानिक हथियार है। कृषि अपशिष्ट को मिट्टी के अनमोल ‘ह्यूमस’ में बदलकर भारत न केवल कृषि क्षेत्र को आत्मनिर्भर बना सकता है, बल्कि दुनिया के सामने वैज्ञानिक स्थिरता (scientific sustainability) और सामाजिक समावेश (social inclusion) का एक उत्कृष्ट उदाहरण भी पेश कर सकता है।


FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न):

Q1: ‘ब्राउन रिवोल्यूशन 2.0’ (भूरी क्रांति 2.0) क्या है?
Ans: यह भारत की बीमार मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए प्रस्तावित एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन है। इसके तहत कृषि कचरे को खुले में जलाने के बजाय सहकारी समितियों के माध्यम से कंपोस्ट, वर्मीकंपोस्ट और बायोचार जैसे जैविक खाद में बदला जाएगा।

Q2: यह पहली भूरी क्रांति (Brown Revolution 1.0) से कैसे अलग है?
Ans: हीरालाल चौधरी द्वारा शुरू की गई पहली भूरी क्रांति विशाखापत्तनम के आदिवासी क्षेत्रों में चमड़े और कॉफी उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए थी। जबकि ब्राउन रिवोल्यूशन 2.0 का मुख्य उद्देश्य देश की मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन को बढ़ाना और पर्यावरण को बचाना है।

Q3: इस योजना के तहत किसानों को क्या आर्थिक लाभ मिल सकते हैं?
Ans: किसानों को महंगे रासायनिक खादों पर होने वाले खर्च से राहत मिलेगी। इसके अलावा, सरकार द्वारा प्रोसेस्ड बायोमास के लिए MSP जैसी वित्तीय सहायता और कार्बन क्रेडिट सिस्टम के जरिए अतिरिक्त कमाई का मौका भी मिल सकता है।

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