देश में डिजिटल लेन-देन के सबसे पसंदीदा माध्यम यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) पर शुल्क (चार्ज) लगाने को लेकर छिड़ी बहस के बीच नीति आयोग (NITI Aayog) ने बड़ा स्पष्टीकरण दिया है। नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि यूपीआई ट्रांजैक्शन पर एक मामूली शुल्क लगाना लंबे समय में क्यों जरूरी है। बुधवार (16 सितंबर 2026) को सामने आई इस रिपोर्ट के अनुसार, आयोग ने तर्क दिया है कि डिजिटल भुगतान प्रणाली की वित्तीय स्थिरता, सुरक्षा और इसके निरंतर विकास को सुनिश्चित करने के लिए बैंकों और सेवा प्रदाताओं को न्यूनतम संसाधन मिलना आवश्यक है।
यूपीआई को हमेशा के लिए मुफ्त रखना वित्तीय रूप से व्यावहारिक नहीं: नीति आयोग
दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में यूपीआई (UPI) डिजिटल लेन-देन का सबसे बड़ा और लोकप्रिय जरिया बन चुका है। लेकिन इसके संचालन और रखरखाव पर बैंकों और फिनटेक कंपनियों (जैसे फोनपे, गूगल पे, पेटीएम) को भारी वित्तीय लागत उठानी पड़ती है। नीति आयोग ने स्पष्ट किया है कि यूपीआई को हमेशा के लिए पूरी तरह से मुफ्त रखना व्यावहारिक नहीं है। बुनियादी ढांचे की मजबूती और सुचारू संचालन के लिए एक टिकाऊ राजस्व मॉडल (सस्टेनेबल रेवेन्यू मॉडल) का होना अनिवार्य है।
ये हैं वे 4 मुख्य कारण जिनकी वजह से जरूरी है मामूली शुल्क
नीति आयोग ने यूपीआई पर मामूली शुल्क या मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने के पक्ष में चार मुख्य कारण बतलाए हैं:
- बुनियादी ढांचे का रखरखाव: यूपीआई के विशाल सर्वर, प्रोसेसिंग नेटवर्क और तकनीकी ढांचे को दुरुस्त रखने के लिए निरंतर भारी निवेश की आवश्यकता होती है, जो फिलहाल बैंक और सेवा प्रदाता खुद वहन कर रहे हैं।
- साइबर सुरक्षा और धोखाधड़ी से बचाव: डिजिटल लेन-देन के बढ़ने के साथ ही साइबर हमलों और वित्तीय धोखाधड़ी (स्कैम) का खतरा भी बढ़ा है। सुरक्षा प्रणालियों को और अधिक अभेद्य और आधुनिक बनाने के लिए अतिरिक्त फंड की जरूरत है।
- तकनीकी नवाचार और वैश्विक विस्तार: ऑफलाइन यूपीआई, वॉयस-बेस्ड पेमेंट और यूपीआई को वैश्विक स्तर पर अन्य देशों में शुरू करने जैसे नए तकनीकी प्रयोगों को बढ़ावा देने के लिए संसाधन आवश्यक हैं।
- बैंकों की वित्तीय स्थिरता: सरकारी और निजी बैंकों पर मुफ्त डिजिटल लेन-देन का भारी बोझ पड़ता है। बैंकों की वित्तीय सेहत को बनाए रखने और उन्हें डिजिटल सेवाओं को बेहतर करने के लिए प्रेरित करने के लिए यह शुल्क सहायक होगा।
आम उपभोक्ताओं पर नहीं बल्कि मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर शुल्क का प्रस्ताव
चर्चाओं और विवादों के बीच, नीति आयोग ने यह भी साफ किया है कि इस शुल्क का बोझ आम उपभोक्ताओं या सामान्य पीटूपी (पीयर-टू-पीयर) लेन-देन करने वाले लोगों पर डालने के बजाय एक संतुलित मॉडल तैयार किया जा सकता है। इसके तहत केवल व्यावसायिक लेन-देन (मर्चेंट ट्रांजैक्शन) या एक निश्चित सीमा से अधिक के बड़े भुगतानों पर ही मामूली शुल्क (MDR) लगाने का प्रस्ताव है।
वित्त मंत्रालय और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने पहले भी स्पष्ट किया है कि यूपीआई एक 'डिजिटल पब्लिक गुड' (सार्वजनिक डिजिटल वस्तु) है और आम उपभोक्ताओं पर तत्काल कोई अतिरिक्त चार्ज लगाने की कोई योजना नहीं है। हालांकि, यूपीआई पारिस्थितिकी तंत्र को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए नीति आयोग की यह रिपोर्ट नीतिगत स्तर पर एक नई बहस को जन्म देती है।
FAQ:
Q1: क्या आम उपभोक्ताओं को यूपीआई (UPI) से पेमेंट करने पर चार्ज देना होगा?
A1: नहीं, वित्त मंत्रालय और एनपीसीआई (NPCI) ने पहले ही स्पष्ट किया है कि यूपीआई एक डिजिटल पब्लिक गुड है और आम उपभोक्ताओं पर तत्काल कोई अतिरिक्त शुल्क लगाने की कोई योजना नहीं है। नीति आयोग ने केवल व्यावसायिक (मर्चेंट) लेन-देन पर संतुलित शुल्क लगाने का सुझाव दिया है।
Q2: नीति आयोग के अनुसार यूपीआई पर मामूली शुल्क लगाना क्यों आवश्यक है?
A2: नीति आयोग के अनुसार, यूपीआई के विशाल तकनीकी बुनियादी ढांचे के रखरखाव, साइबर सुरक्षा व धोखाधड़ी से बचाव के लिए उन्नत प्रणालियों के निर्माण, तकनीकी नवाचारों तथा बैंकों की वित्तीय स्थिरता को बनाए रखने के लिए एक मामूली शुल्क आवश्यक है।
Q3: यूपीआई को पूरी तरह और हमेशा के लिए मुफ्त रखने से क्या नुकसान हो सकता है?
A3: हमेशा के लिए यूपीआई को पूरी तरह मुफ्त रखने से बैंकों और फिनटेक प्रदाताओं पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता है, जिससे लंबे समय में इस डिजिटल भुगतान प्रणाली का बुनियादी ढांचा आर्थिक रूप से व्यावहारिक (सस्टेनेबल) नहीं रह पाएगा।



