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Ganga Expressway vs Yamuna Expressway: क्यों यमुना एक्सप्रेसवे के सामने फीका पड़ रहा है गंगा एक्सप्रेसवे? समझें पूरा चुनावी गणित

Ganga Expressway vs Yamuna Expressway: अगर आप उत्तर प्रदेश की राजनीति को थोड़ा भी करीब से देखते हैं, तो आपको पता होगा कि अब यहां चुनाव धर्म या जाति से ज्यादा 'एक्सप्रेसवे' (Expressways)

Priyanshi Singh (वरिष्ठ संवाददाता)

16 जुलाई 2026

Ganga Expressway vs Yamuna Expressway: क्यों यमुना एक्सप्रेसवे के सामने फीका पड़ रहा है गंगा एक्सप्रेसवे? समझें पूरा चुनावी गणित

Ganga Expressway vs Yamuna Expressway: अगर आप उत्तर प्रदेश की राजनीति को थोड़ा भी करीब से देखते हैं, तो आपको पता होगा कि अब यहां चुनाव धर्म या जाति से ज्यादा ‘एक्सप्रेसवे’ (Expressways) के इर्द-गिर्द घूमने लगे हैं। 2027 के विधानसभा चुनावों में अभी वक्त है, लेकिन सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच ‘विकास के असली मॉडल’ को लेकर अभी से कांटे की टक्कर शुरू हो गई है।

एक तरफ मौजूदा सरकार 594 किलोमीटर लंबे ‘गंगा एक्सप्रेसवे’ (Ganga Expressway) को अपना सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक बता रही है। वहीं, दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी (सपा) और कई राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पुराने ‘यमुना एक्सप्रेसवे’ (Yamuna Expressway) की सफलता और उसके विजन के आगे आज की नई परियोजनाएं काफी छोटी नजर आती हैं। आइए, एक दोस्त की तरह बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर नई सड़क (गंगा एक्सप्रेसवे) की तुलना पुरानी सड़क (यमुना एक्सप्रेसवे) से क्यों हो रही है और इसके पीछे का असली राजनीतिक गणित क्या है।

सिर्फ डामर बिछाना नहीं, अर्थव्यवस्था बनाना है असल मकसद

सड़कें तो हमारे देश में रोज बन रही हैं, लेकिन किसी भी बड़े एक्सप्रेसवे का असली मतलब सिर्फ दो शहरों को डामर की सड़क से जोड़ना नहीं होता। इसका असली मकसद होता है उस सड़क के किनारे एक पूरा ‘आर्थिक तंत्र’ (Economic Ecosystem) खड़ा करना, जहां फैक्ट्रियां लगें, लोगों को रोजगार मिले और व्यापार बढ़े। समीक्षकों का मानना है कि इसी पैमाने पर यमुना एक्सप्रेसवे आज भी बाजी मार रहा है।

यमुना एक्सप्रेसवे: क्यों है यह आज भी नंबर वन?

अगर हम ग्रेटर नोएडा से आगरा तक जाने वाले यमुना एक्सप्रेसवे की बात करें, तो यह आज सिर्फ एक सड़क नहीं रह गया है, बल्कि ग्लोबल प्रोजेक्ट्स का एक बड़ा हब बन चुका है।

  • बड़े प्रोजेक्ट्स: आज इसी एक्सप्रेसवे के किनारे देश का सबसे बड़ा ‘जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट’, फिल्म सिटी, मेडिकल डिवाइस पार्क और फॉर्मूला-1 ट्रैक जैसी चीजें मौजूद हैं।

  • निवेश और रोजगार: यमुना अथॉरिटी (YEIDA) के तहत इस रूट पर हजारों करोड़ रुपये का जमीन पर निवेश हो चुका है। इससे लोकल लोगों और युवाओं के लिए लाखों डायरेक्ट और इनडायरेक्ट नौकरियां पैदा हुई हैं।
    विपक्ष का कहना है कि इसके उलट, मेरठ से प्रयागराज तक बन रहे गंगा एक्सप्रेसवे के किनारे अभी औद्योगिक कॉरीडोर (Industrial Corridors) सिर्फ सरकारी फाइलों और घोषणाओं तक ही सीमित हैं। जमीन पर अभी फैक्ट्रियां या रोजगार नजर नहीं आ रहे हैं।

विपक्ष (सपा) का गंगा एक्सप्रेसवे पर क्या है आरोप?

समाजवादी पार्टी लगातार यह दावा कर रही है कि यूपी में शानदार सड़कों और उसके किनारे विकास का जो असली ‘ब्लूप्रिंट’ था, वो उनकी सरकार ने तैयार किया था। सपा ने मौजूदा सरकार पर पुरानी ‘एक्सप्रेसवे कल्चर’ की नकल करने का आरोप लगाया है। सपा के मुख्य आरोप कुछ इस तरह हैं:

1. क्वालिटी और बजट पर सवाल:
सपा का तर्क है कि यमुना एक्सप्रेसवे पूरी तरह से मजबूत कंक्रीट (Rigid Pavement) से बना है, जिसकी उम्र कई दशकों की है और क्वालिटी शानदार है। लेकिन मौजूदा सरकार में बने एक्सप्रेसवे (जैसे पिछले दिनों बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे के धंसने की तस्वीरें सामने आई थीं) की क्वालिटी पर सवाल उठ रहे हैं। विपक्ष का दावा है कि भारी भरकम बजट के बाद भी निर्माण में वो पुरानी क्वालिटी नहीं दिख रही है। साथ ही टेंडर और निर्माण की लागत भी कई गुना बढ़ गई है।

2. ‘किसानों की अनदेखी और कॉर्पोरेट का फायदा’:
अखिलेश यादव की पार्टी का कहना है कि जब आगरा-लखनऊ या यमुना एक्सप्रेसवे बने थे, तो किसानों के लिए कृषि मंडियां और लॉजिस्टिक पार्क बनाने का विजन रखा गया था। लेकिन गंगा एक्सप्रेसवे के लिए किसानों से बड़े पैमाने पर जमीनें तो ले ली गईं, लेकिन उस हिसाब से वहां रोजगार या लोकल विकास की कोई ठोस योजना नहीं दिख रही है। सपा इसे सिर्फ बड़े कॉर्पोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने वाली नीति बता रही है।

क्या गंगा एक्सप्रेसवे सिर्फ एक ‘चुनावी हाईवे’ है?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि गंगा एक्सप्रेसवे के जरिए मौजूदा सरकार पश्चिमी यूपी (मेरठ) और पूर्वी यूपी (प्रयागराज) के वोटरों को साधने की कोशिश कर रही है। यह 2027 के चुनाव के लिए एक बड़ा कार्ड है।

लेकिन अर्थशास्त्र के हिसाब से देखें, तो किसी भी नए एक्सप्रेसवे से ‘इकोनॉमिक रिटर्न’ (यानी वहां बिजनेस और रोजगार सेट होने में) कई दशक लग जाते हैं। यमुना एक्सप्रेसवे का इकोसिस्टम 2012 से धीरे-धीरे विकसित हो रहा है और आज वह पूरी तरह से परिपक्व (Mature) हो चुका है। गंगा एक्सप्रेसवे को इस मुकाम तक पहुंचने में अभी बहुत लंबा वक्त लगेगा।

कुल मिलाकर, 2027 के चुनावों में ‘एक्सप्रेसवे पॉलिटिक्स’ एक बहुत बड़ा मुद्दा रहने वाली है। सवाल यह है कि क्या मौजूदा सरकार सिर्फ नई सड़कों का फीता काटने पर जोर दे रही है, या फिर आने वाले समय में इन सड़कों के किनारे युवाओं के लिए कोई वास्तविक रोजगार का ढांचा भी खड़ा होगा? जनता को अब सिर्फ चिकनी सड़कें नहीं, बल्कि उन सड़कों के किनारे फैक्ट्रियां और नौकरियां भी चाहिए। अब देखना यह है कि चुनाव आते-आते जनता किस सरकार के ‘विकास मॉडल’ पर अपना मोहर लगाती है।

“छात्रों की स्वास्थ्य और सुरक्षा के साथ कोई समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अनियमितताओं पर कठोरतम प्रशासनिक कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।”

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