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Muharram 2026: हजरत अब्बास की प्यास से लेकर ‘नज़री' की परंपरा तक, जानिए शिया मुसलमानों के लिए क्यों खास है ये महीना

Muharram 2026:  इस्लाम धर्म में मुहर्रम (Muharram) का महीना बहुत ही पवित्र और गम का महीना माना जाता है। पूरी दुनिया में शिया मुसलमान इस महीने में पैगंबर मोहम्मद के नवासे

Mehul Pandey (वरिष्ठ संवाददाता)

26 जून 2026

Muharram 2026: हजरत अब्बास की प्यास से लेकर ‘नज़री' की परंपरा तक, जानिए शिया मुसलमानों के लिए क्यों खास है ये महीना

Muharram 2026:  इस्लाम धर्म में मुहर्रम (Muharram) का महीना बहुत ही पवित्र और गम का महीना माना जाता है। पूरी दुनिया में शिया मुसलमान इस महीने में पैगंबर मोहम्मद के नवासे (नाते) इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की शहादत को याद करते हैं। लेकिन, इस साल ईरान (Iran) में मुहर्रम और आशूरा (Ashura) का मातम हर साल से बिल्कुल अलग था। इस बार हवा में सिर्फ कर्बला का गम नहीं था, बल्कि एक ताजा दर्द भी घुला हुआ था।

ईरान की सड़कों पर लाखों लोगों का हुजूम काले कपड़े पहनकर निकला, लेकिन इस बार लोगों की आंखों में दोगुने आंसू थे। आइए, एक दोस्त की तरह बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं कि इस बार का मुहर्रम ईरान के लोगों के लिए इतना ज्यादा भावुक क्यों था, आशूरा का इतिहास क्या है और वहां लोगों ने इस गम को कैसे मनाया।

इस बार का मुहर्रम ईरान के लिए इतना खास और भावुक क्यों रहा?

अगर आप अंतरराष्ट्रीय खबरों पर नजर रखते हैं, तो आपको पता होगा कि इसी साल 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर बड़े हमले किए थे। इन हमलों ने ईरान को बहुत गहरा घाव दिया है।

इस युद्ध में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई (Ayatollah Seyyed Ali Khamenei) के साथ-साथ सेना के कई बड़े अधिकारी और हजारों मासूम आम नागरिक मारे गए थे। 28 फरवरी के उन हमलों के बाद यह ईरान का पहला मुहर्रम था। इसीलिए, इस बार जब लोग सड़कों पर मातम मनाने निकले, तो उन्होंने सिर्फ 1400 साल पुरानी कर्बला की जंग के शहीदों को ही याद नहीं किया, बल्कि हाल ही के युद्ध में मारे गए अपने नेताओं और अपनों को भी श्रद्धांजलि दी। जिस जगह पर अयातुल्ला खामेनेई की शहादत हुई थी, वहां मातम करने वालों की भारी भीड़ इकट्ठा हुई और माहौल बेहद गमगीन हो गया।

कैसे मनाया गया आशूरा? (सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब)

ईरान में गुरुवार के दिन मुहर्रम की 10वीं तारीख यानी ‘आशूरा’ मनाई गई। देश की राजधानी से लेकर छोटे-छोटे गांवों तक, लाखों लोग काले लिबास में सड़कों पर उतर आए।

ईरान के करज (Karaj) और अन्य शहरों से जो तस्वीरें सामने आई हैं, वो बताती हैं कि लोगों का दुख कितना गहरा था। लोगों ने सीना पीटकर मातम किया, इमाम हुसैन की याद में ‘नौहे’ (शोक गीत) पढ़े और आंसू बहाए। हर गली, हर मोहल्ले से मातमी जुलूस निकले और फिजाओं में सिर्फ ‘या हुसैन’ की सदाएं (आवाजें) गूंजती रहीं।

‘तासुआ’ का दिन और हजरत अब्बास की कुर्बानी

आशूरा (10 मुहर्रम) से ठीक एक दिन पहले यानी 9 मुहर्रम को ‘तासुआ’ (Tasua) मनाया जाता है। यह दिन इमाम हुसैन के सौतेले भाई हजरत अब्बास को समर्पित है।

कर्बला की जंग में जब यजीद की सेना ने इमाम हुसैन के खेमे का पानी बंद कर दिया था, तब हजरत अब्बास प्यासे बच्चों और औरतों के लिए पानी लाने गए थे। पानी लाने की इसी कोशिश में दुश्मनों ने उन्हें शहीद कर दिया था। ईरान और पूरी दुनिया के शिया मुसलमानों ने तासुआ के दिन हजरत अब्बास की इसी बहादुरी और कुर्बानी को याद किया।

कर्बला का इतिहास: शिया मुसलमानों के लिए क्या है आशूरा की अहमियत?

अब थोड़ा इतिहास के पन्नों में चलते हैं। आखिर आशूरा का दिन इतना अहम क्यों है?
आज से सदियों पहले, 680 ईस्वी में इराक के कर्बला के मैदान में एक बहुत बड़ी जंग हुई थी। यह जंग सत्ता की नहीं, बल्कि हक और बातिल (सच और झूठ) की थी। एक तरफ जालिम और क्रूर उमय्यद शासक यजीद प्रथम की हजारों सैनिकों वाली भारी-भरकम फौज थी, और दूसरी तरफ पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन और उनके परिवार व दोस्तों समेत सिर्फ 72 लोग थे।

इमाम हुसैन ने यजीद के जुल्म और अन्याय के आगे सिर झुकाने से साफ इंकार कर दिया था। इसी दिन (आशूरा को) इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों को बेरहमी से शहीद कर दिया गया था। इसीलिए आज भी इमाम हुसैन की शहादत को जुल्म और अत्याचार के खिलाफ दुनिया का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।

‘नज़री’ की परंपरा: इंसानियत और सेवा का पैगाम

जिस तरह हमारे यहां लंगर या भंडारा होता है, बिल्कुल वैसे ही मुहर्रम के दौरान ईरान में ‘नज़री’ (Nazri) बांटने की एक बहुत पुरानी परंपरा है।

पूरे ईरान में लोगों ने बड़े पैमाने पर मुफ्त भोजन बनाया और उसे मातम करने वालों, गरीबों और जरूरतमंदों के बीच बांटा। यह ‘नज़री’ सिर्फ खाना नहीं है, बल्कि यह इमाम हुसैन की इंसानियत, उदारता और भूखों को खाना खिलाने की सीख का एक खूबसूरत प्रतीक है।

मुहर्रम सिर्फ एक शोक का महीना नहीं है, बल्कि यह हमें सिखाता है कि चाहे सामने वाला कितना भी ताकतवर क्यों न हो, अन्याय के खिलाफ हमेशा खड़े रहना चाहिए। इस साल ईरान के लोगों ने अपने मौजूदा दुखों को कर्बला के इतिहास के साथ जोड़कर जिस तरह से आशूरा मनाया है, वह बताता है कि इमाम हुसैन की दी हुई हिम्मत आज भी उनके दिलों में जिंदा है। सिर्फ ईरान ही नहीं, दुनिया भर से लाखों जायरीन (श्रद्धालु) इस मौके पर इराक के पवित्र शहर कर्बला पहुंचे और इमाम हुसैन की दरगाह पर अपनी अकीदत (श्रद्धांजलि) पेश की।

“छात्रों की स्वास्थ्य और सुरक्षा के साथ कोई समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अनियमितताओं पर कठोरतम प्रशासनिक कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।”

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