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उत्तराखंड में आपदा के बाद खतरा बनी कृत्रिम झील, ​​नौसेना के गोताखोरों ने नापी ​झील ​की ​गहराई

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तपोवन से करीब 15 किमी. ऊपर बनी कृत्रिम हिमनद झील से उत्पन्न खतरे का आकलन करने के लिए एसडीआरएफ की टीम वहां डेरा डाले हुए है।​ अभीतक इस झील की गहराई नहीं नापी जा सकी है जिससे इससे होने वाले खतरों का आकलन किया जा सके। 17 फरवरी को डीआरडीओ के 3 वैज्ञानिकों का एक दल एसडीआरएफ के साथ गया था जो अभी भी झील इलाके में रुका हुआ है। एसडीआरएफ की टीम ने पानी का दबाव कम करने के लिए झील के मुहाने को आइस एक्स के माध्यम से खोला। साथ ही वापसी के दौरान टीम ने बीहड़ एवं ग्लेशियर वाले स्थानों पर रोप, हुक भी बांधकर छोड़ दिए जिससे आनेवाली दूसरी टीमों को दिक्कतों का सामना न करना पड़े। इस क्षेत्र तक पहुंचने वाला यह पहला मॉन्ट्रेनियिंग दल था जो पैदल मार्गों से जलभराव क्षेत्र तक पहुंचा था।

वैज्ञानिक दस्ते के साथ भेजे गए एसडीआरएफ कर्मी माउंटेनिरिंग दल के सदस्य थे जिन्हें पूर्व में हाई एल्टीट्यूड स्थानों में रेस्कयू का अनुभव है। इन सबके बावजूद उत्तराखंड प्रशासन इस ​कृत्रिम झील की गहराई मापने में सक्षम नहीं था जिससे पानी की निकासी का उपाय निकाला जा सके। इन्हीं सब वजहों से अबतक इस कृत्रिम झील की गहराई नहीं नापी जा सकी जिससे इससे आगे होने वाले खतरों का आकलन किया जा सके। चूंकि झील तक नौसेना के गोताखोरों की टीम को पहुंचने के लिए सड़क मार्ग नहीं था। इसलिए समय की महत्वपूर्णता के साथ नौसेना और वायुसेना ने एक संयुक्त ऑपरेशन लांच किया।

वायुसेना के एडवांस लाइट हेलीकाप्टर (एएलएच) के जरिये नौसेना के गोताखोरों को झील की गहराई नापने के लिए समुद्र तल से 14 हजार फीट की ऊंचाई पर उतारा गया। नौसेना के गोताखोरों ने बर्फ़ीले पानी में गहराई मापने वाले उपकरण का उपयोग करके हीलो से नीचे उतरने और गहराई की रिकॉर्डिंग के चुनौतीपूर्ण कार्य को अंजाम दिया। इस दौरान वायुसेना के पायलटों ने कठिन इलाके में सटीक स्थिति बनाए रखी। अब नौसेना द्वारा इकट्ठा किये गए महत्वपूर्ण डेटा का उपयोग करके वैज्ञानिक बांध की मिट्टी की दीवार पर दबाव का निर्धारण कर सकेंगे।

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