बिठूर के नान राव स्मारक पार्क पहुंचते ही हो जाती हैं यादें ताज़ा

admin
By admin
3 Min Read

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर 1947 की आजादी की लड़ाई तक हुए स्वतंत्रता आंदोलनों से कानपुर का गहरा नाता रहा है. कानपुर शहर अनेकों वीरों की जन्म व कर्म स्थली रहा है. तात्या टोपे, नानाराव पेशवा व झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी वीरता से तो वहीं गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपने लेखों व हसरत मोहानी ने इंक़लाब ज़िंदाबाद का नारा देकर इस धरती पर अंग्रेजी हुकूमत के दांत खट्टे कर दिए थे. इन वीरों की यादें आज भी बिठूर के नान राव स्मारक पार्क पहुंचते ही ताज़ा हो जाती है. यहां बनाए गए संग्राहलय में इन वीर सुपूतों के शस्त्र, तस्वीरें व साहित्य आज भी मौजूद हैं. यहां पर 1857 क्रांति के समय के अस्त्र-शस्त्र भी रखे हुए हैं, जो इस संग्राहलय के मुख्य आकर्षण का केंद्र है. जिन्हें देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं.

 

प्रताप अखराबर व मुग़लों के शाही फ़रमान की प्रतियां भी हैं मौजूद 

बिठूर की धरती पर हुई प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में नाना साहब, तात्या टोपे व अजीमुल्लाह खां ने अंग्रेजो को लोहे के चने चबवा दिए थे. उनके इतिहास की कहानियां व फोटो संग्रहालय में मौजूद हैं. यहां पर तात्या टोपे का खंजर भी रखा हुआ है. जिससे उन्होंने कई अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया था. अगर कहा जाए कि संग्राहलय की दीवारें 1857 की क्रांति के इतिहास से पटी हुई हैं तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. यहां पर तात्या टोपे की परिवार की रिहाई का वह शाही परवाना भी रखा हुआ है जिसे 28 फरवरी 1858 में लिखा गया था. यहां पर कानपुर से शुरू हुई डाक सेवा, समाचार पत्र प्रताप के कई महत्तवपूर्ण संस्करणों की प्रतियां भी मौजूद हैं. 

2005 में स्थापित हुआ था संग्राहलय 

बिठूर के नानाराव पेशवा स्मारक में कानपुर संग्रहालय 2005 में स्थापित हुआ. अंग्रेजों व स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के संघर्ष की गाथा सुनाने वाला इस संग्रहालय को लगातार विकसित किया जा रहा है. बिठूर की यह वीरभूमि वीरांगना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की याद भी दिलाती है. यहीं पर लक्ष्मीबाई का बचपन बीता था. लक्ष्मीबाई ने तात्याटोपे के साथ तलवार चलाना सीखा और घुड़सवारी भी की.

Share This Article
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *