महिलाओं को मोदी सरकार का एक ओर तोहफा, मंत्रिमंडल की मिली मंजूरी सहायक प्रजनन तकनीक विधेयक को

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नई दिल्ली। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ‘सहायक प्रजनन तकनीक नियमन विधेयक 2020’ को मंजूरी दे दी है। इस विधायी उपाय को महिलाओं के प्रजनन अधिकारों के संरक्षण के लिए एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को ‘सहायक प्रजनन तकनीक नियमन विधेयक 2020’ को मंजूरी प्रदान की। संसद में ‘सरोगेसी नियमन विधेयक 2020’ को पेश करने और ‘चिकित्सा गर्भपात संशोधन विधेयक 2020’ को मंजूरी देने के बाद सरकार ने महिलाओं के हक में यह एक अहम कदम उठाया गया है।

मंत्रिमंडल के मुताबिक, इस कानून का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि यह देश में सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी सेवाओं का नियमन करेगा। इसलिए यह कानून बांझ दंपतियों में सहायक प्रजनन तकनीक (एआरटी) के तहत नैतिक तौर-तरीकों को अपनाए जाने के संबंध में कहीं अधिक भरोसा पैदा करेगा।

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अपने फैसले में कहा “संसद में पारित हो जाने एवं इस विधेयक के कानून का रूप लेने के बाद केंद्र सरकार इस अधिनियम पर अमल की तिथि को अधिसूचित करेगी। इसके बाद राष्ट्रीय बोर्ड का गठन किया जाएगा।”

राष्ट्रीय बोर्ड भौतिक अवसंरचना, प्रयोगशाला एवं नैदानिक उपकरणों तथा क्लिनिकों एवं बैंकों में रखे जाने वाले विशेषज्ञों के लिए न्यूनतम मानक तय करने के लिए आचार संहिता निर्धारित करेगा। इसका अनुपालन क्लिनिक में काम करने वाले लोगों को करना होगा। केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचना जारी किए जाने के तीन महीने के भीतर राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेश इसके लिए राज्य बोर्ड और राज्य प्राधिकरणों का गठन करेंगे।

राज्य बोर्ड पर संबंधित राज्य में क्लीनिकों एवं बैंकों के लिए राष्ट्रीय बोर्ड द्वारा निर्धारित नीतियों एवं योजनाओं को लागू करने की जिम्मेदारी होगी।

विधेयक में केंद्रीय डेटाबेस के रखरखाव तथा राष्ट्रीय बोर्ड के कामकाज में उसकी सहायता के लिए राष्ट्रीय रजिस्ट्री एवं पंजीकरण प्राधिकरण का भी प्रावधान किया गया है। विधेयक में उन लोगों के लिए कठोर दंड का भी प्रस्ताव किया गया है, जो लिंग जांच, मानवभ्रूण या जननकोष की बिक्री का काम करते हैं और इस तरह के गैर-कानूनी कार्यो के लिए एजेंसियां, गोरखधंधा, संगठन चलाते हैं।

पिछले कुछ वर्षो के दौरान सहायक प्रजनन तकनीक (एआरटी) का चलन काफी तेजी से बढ़ा है। एआरटी केंद्रों और हर साल होने वाले एआरटी चक्रों की संख्या में सर्वाधिक वृद्धि दर्ज करने वाले देशों में भारत भी शामिल है। वैसे तो इन-व्रिटो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) सहित सहायक प्रजनन तकनीक ने बांझपन के शिकार तमाम लोगों में नई उम्मीदें जगा दी हैं, लेकिन इससे जुड़े कई कानूनी, नैतिक और सामाजिक मुद्दे भी सामने आए हैं।

इस वैश्विक प्रजनन उद्योग के प्रमुख केंद्रों में अब भारत भी शामिल हो गया है। यही नहीं, प्रजनन चिकित्सा पर्यटन का भी चलन तेजी से बढ़ता जा रहा है। भारत में इससे संबंधित क्लिनिक अब जननकोश दान करना, अंतर्गर्भाशयी गर्भाधान (आईयूआई), आईवीएफ, आईसीएसआई, पीजीडी और गर्भकालीन सरोगेसी जैसी लगभग सभी तरह की एआरटी सेवाएं मुहैया करा रहे हैं।

हालांकि, भारत में इस तरह की अनेक सेवाएं मुहैया कराने के बावजूद संबंधित प्रोटोकॉल का अब तक कोई मानकीकरण नहीं हो पाया है और इस बारे में सूचनाएं देने का चलन अब भी काफी हद तक अपर्याप्त है।

सहायक प्रजनन तकनीक सेवाओं के नियमन का मुख्य उद्देश्य संबंधित महिलाओं एवं बच्चों को शोषण से संरक्षण प्रदान करना है। डिम्बाणुजन कोशिका दाता को बीमा कवर मुहैया कराने एवं कई भ्रूण आरोपण से संरक्षण प्रदान करने की जरूरत है और इसके साथ ही सहायक प्रजनन तकनीक से जन्म लेने वाले बच्चों को किसी जैविक बच्चे की भांति ही समान अधिकार देने की जरूरत है।

एआरटी बैंकों द्वारा किए जाने वाले शुक्राणु, डिम्बाणुजन कोशिका और भ्रूण के निम्नताप परिरक्षण का नियमन करने की जरूरत है और इस विधेयक का उद्देश्य सहायक प्रजनन तकनीक के जरिए जन्म लेने वाले बच्चे के हित में आनुवांशिक पूर्व आरोपण परीक्षण को अनिवार्य बनाना है।

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