अफगानिस्‍तान से आया उमेद बेहतर जिंदगी की तलाश में भारत आ गए थे लाजपत नगर में फ्रेंच फ्राइज बनाकर बेचते हैं

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नई दिल्‍ली. अफगानिस्‍तान (Afghanistan) में तालिबान (Taliban) के कब्‍जे के बाद से दिनोंदिन हालात खराब हो रहे हैं. अफगानिस्‍तान में फंसे दूसरे देशों के नागरिकों के साथ ही वहां के निवासी भी देश छोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में कुछ लोग पहले ही अफगानिस्‍तान छोड़कर बाहर आ गए थे. इनमें से एक है उमेद. वह पांच महीने पहले बेहतर जिंदगी की तलाश में अफगानिस्‍तान छोड़कर भारत आ गए थे. अब वह दिल्‍ली के लाजपत नगर में फ्रेंच फ्राइज बनाकर बेचते हैं. उनका कहना है कि अगर वह वापस अफगानिस्‍तान गए तो उन्‍हें मार दिया जाएगा.

उमेद अफगानिस्‍तान की स्‍पेशल फोर्स के जवान थे. एनबीटी की रिपोर्ट के अनुसार अब वह दिल्‍ली में रोजाना फ्रेंच फाइज बेचकर 300 रुपये कमाते हैं. वह हिंदी सीखने की भी कोशिश कर रहे हैं. उमेद का कहना है कि कल क्‍या होगा, यह नहीं पता है. वह अच्‍छे काम की तलाश में हैं. लेकिन कहां और कैसे शुरू करें, इसका जवाब उनके पास भी नहीं है.

उमेद का कहना है कि उन्‍हें उनके वे दोस्‍त हमेशा याद आते हैं जो तालिबान के साथ जंग लड़ते हुए युद्ध के मैदान में मारे गए. उन्‍होंने बताया कि जब वह दो साल के थे तब ही उनके मां-बाप सड़क हादसे में गुजर गए थे. अब वह दिल्‍ली में रिफ्यूजी कार्ड के सहारे रह रहे हैं.

उमेद का कहना है कि अफगान फोर्स में रहते हुए उनकी तैनाती कई जगहों पर हुई थी. उन्‍होंने लड़ते हुए कई तालिबान लड़ाकों को मारा है. यही कारण है कि वह अब तालिबान की हिट लिस्‍ट में हैं. उनके पास कई मिशन के वीडियो भी हैं. उनका कहना है कि जैसे ही वह वापस वहां जाएंगे, उन्‍हें मार दिया जाएगा. उन्‍होंने अपने शरीर के जख्‍म भी दिखाए. उनका कहना है कि तालिबान से लड़‍ते हुए उन्‍हें कभी गोली नहीं लगी. लेकिन हां छर्रे कई बार लगे हैं. उनके कई दोस्‍तों को भी उन्‍होंने तालिबान के साथ जंग में मरते देखा है.

उमेद ने कहा है कि अफगानिस्‍तान सरकार तालिबान के आगे कुछ कर नहीं पा रही थी. तालिबानी हमेशा आगे थे. अगर वह वहां से भागते नहीं तो उनके पास दो विकल्‍प थे. पहली कि या तो वह मर जाएं और दूसरा कि वह तालिबान के बंधक हो जाएं. उन्‍होंने बताया कि वह जब 18 साल के थे तब उन्‍होंने फौज ज्‍वाइन की थी. उनके अंकल से उनकी बनती नहीं है. वह तालिबान के लड़ाके हैं. उनका कहना है कि उन्‍हें उनका देश बहुत याद आता है. लेकिन अब मजबूर हैं.

उन्‍होंने कहा, ‘भारत भी अच्‍छा है, लेकिन एक अफगानी के लिए यहां कुछ मुश्किलें हैं. यहां पुलिस से लेकर एमसीडी तक का चक्‍कर रहता है. दूसरा देश होने के कारण यहां के नियम भी अलग हैं. घर का किराया देने के साथ ही अन्‍य भी कई समस्‍याएं हैं. मेरे पास मौजूदा समय में यूनिसेफ का कार्ड है. आगे रहने के लिए क्‍या करना है यह भी बड़ी चिंता है.’

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