पेंशन योजनाओं की खूबियां : क्या अच्छा, क्या बुरा और अवांछनीय है

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कर्नाटक आगामी विधानसभा चुनावों के लिए तैयार है, भव्य पुरानी पार्टी के चुनावी वादों में कई लोक कल्याणकारी उपायों की बात कही गई है। आगामी चुनावों के लिए कांग्रेस का रोड मैप, कोटा वृद्धि और सरकार द्वारा बनाए गए ‘अन्यायपूर्ण कानूनों’ को निरस्त करना एवं एक साल के भीतर पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) की वापसी का आश्वासन देता है।

कर्नाटक कांग्रेस के घोषणापत्र में कहा गया है कि पार्टी 2006 से शामिल किए गए सरकारी कर्मचारियों के लिए ओपीएस के विस्तार पर विचार करेगी। पिछले साल हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने इस संबंध में विधानसभा चुनाव से पहले किए गए अपने वादे को पूरा किया। उत्तरी राज्य ने इस साल की शुरुआत में हुई अपनी पहली कैबिनेट बैठक में ओपीएस की बहाली को मंजूरी दी थी।

हिमाचल प्रदेश में नई पेंशन योजना (एनपीएस) के तहत पेंशनधारियों समेत करीब 1.36 लाख कर्मचारी हैं। हालांकि, जहां तक हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के अभियान का संबंध है, यह संकेत देता है कि ओपीएस को बहाल करने के वादे से पार्टी को काफी फायदा हुआ है।

जबकि ओपीएस के मुद्दे ने कांग्रेस को हिमाचल चुनाव में स्पष्ट रूप से जीत ही नहीं दिलाई, बल्कि इसने पार्टी को बड़ा फायदा भी पहुंचाया। लेकिन निश्चित रूप से ओपीएस की बहाली का वादा सरकारी कर्मचारियो,उनके परिवारों और यहां तक कि सरकारी नौकरी के इच्छुक युवा मतदाताओं पर भी प्रभाव डालता है। एनपीएस की समझ और यह ओपीएस से अलग कैसे है, यह मूल रूप से दो प्रतिद्वंद्वी राष्ट्रीय दलों द्वारा शुरू की गई पेंशन प्रणाली में बदलाव है।

2003 में कांग्रेस सरकार द्वारा पेश किए जाने के बाद 2004 में राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली लागू हुई। यह भारतीय नागरिकों के लिए पेंशन का एक परिभाषित योगदान प्रदान करने का दावा करती है। एनपीएस को एक सुरक्षित और स्थिर सेवानिवृत्ति आय प्रदान करने के उद्देश्य से एक विकल्प के रूप में लॉन्च किया गया था।

एनपीएस और ओपीएस के बीच एक मूलभूत अंतर लाभार्थी को प्रदान की जाने वाली गारंटीकृत पेंशन की सीमा है। एनपीएस कोई गारंटीकृत पेंशन प्रदान नहीं करता है, लेकिन ओपीएस व्यक्ति के अंतिम आहरित वेतन और सेवा के वर्षों की संख्या के आधार पर पेंशन प्रदान करता है। जो लोग अपनी सेवानिवृत्ति में गारंटीकृत पेंशन की तलाश कर रहे हैं, उनके लिए ओपीएस एक अधिक सुरक्षित और स्थिर तरीका है।

ओपीएस उन सरकारी कर्मचारियों के लिए है जिन्होंने कम से कम 10 साल की सर्विस पूरी कर ली है। एनपीएस 18 से 60 वर्ष की आयु के बीच भारत के सभी नागरिकों के लिए है और प्राप्त पेंशन व्यक्ति द्वारा किए गए निवेश और बदले में पेंशन फंड द्वारा उत्पन्न रिटर्न पर आधारित है। यह योजना ग्राहक के लिए 5 लाख रुपये का जीवन बीमा कवर भी प्रदान करती है।

इसके अलावा योगदान के संबंध में एनपीएस, ओपीएस की तुलना में अधिक लचीला है क्योंकि ओपीएस के विपरीत एनपीएस के तहत विभिन्न प्रकार के पेंशन फंडों में निवेश करने का विक्लप चुन सकते हैं जबकि ओपीएस विशेष रूप से वेतन और सेवा-अवधि आधारित है।

सरकारी कर्मचारी के मूल वेतन का 14 प्रतिशत तक और निजी क्षेत्र के कर्मचारी के लिए 10 प्रतिशत तक एनपीएस में योगदान कर सकते हैं। यह एक निवेशक के लिए फायदेमंद है क्योंकि यह 1.5 लाख रुपये के 80सी सेक्शन से ऊपर है।

यहां, टीयर -1 अकाउंट के विपरीत एक टीयर -2 अकाउंट अनिवार्य नहीं है, जहां किसी को टैक्स लाभ मिलता है। टीयर-2 को एक निवेश की तरह माना जा सकता है जिसे निवेश के दौरान बाहर निकाला जा सकता है। टीयर-1 का प्राथमिक उद्देश्य टैक्स बचत के साथ लंबी अवधि के लिए निवेश है, जबकि टीयर-2 के लिए यह एक निवेश है।

60 साल की उम्र के बाद कोई भी पैसा निकालने के लिए स्वतंत्र है, 60 प्रतिशत तक की निकासी पहले की जा सकती है और शेष को वार्षिकी में बदला जा सकता है। इसके अतिरिक्त, लाभ के रूप में कोई अपना वार्षिकी भागीदार चुन सकता है।

वर्तमान में, आठ अलग-अलग पेंशन फंड हैं जो वार्षिकी का विकल्प प्रदान करते हैं। कौन सा विकल्प बेहतर है, इस पर विचार करना निवेशक की जोखिम लेने की क्षमता पर निर्भर करता है।

दोनों योजनाओं की तकनीकीताओं के अलावा, आम आदमी के लिए पेंशन योजना सामाजिक और वित्तीय सुरक्षा का एक साधन है, और इसके साथ कोई भी छेड़छाड़ मतदाताओं के मूड को प्रभावित करने और चुनाव परिणामों को प्रभावित करने के लिए बाध्य है।

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