शिव पुराण में लिखी है भगवान शिव के अर्धनारीश्वर रूप की बिल्कुल अलग कथा

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डेस्क। शिव ऐसे देव है जिनकी निराकार और साकार, गृहस्त और सन्यासी, क्रोधिक और भोले इन सभी रूपों में पूजा की जाती है। शिव के भक्त उनको हर जगह ढूंढ ही लेते हैं। भगवान शिव एक ऐसे देव हैं जिनकी सच्चे मन से पूजा-आराधना एवं मंत्र उच्चारण से ही शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण कर देते हैं। भगवान शिव इतने भोले है कि खुश होने पर भक्तों का कल्याण करते हैं। 

कहा जाता है कि शिव की साधना बहुत ही सरल है उन्हें एक लोटा जल से भी प्रसन्न किया जा सकता है। और कुछ न हो तो बस उनका नाम भज कर भी उनकी कृपा पाई जा सकती है।

शिव मंत्र का जाप करते हुए सिर्फ एक बेलपत्र या शमी चढ़ाने भर से भी महादेव की कृपा बरसने लगती है। शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव की अराधना के लिए सोमवार का दिन उत्तम माना गया है। विशेष रूप से सोमवार के ही महादेव की उपासना करने से मनुष्य के सभी सनताप दूर हो जाते हैं। 

भक्त भोलेनाथ को पूरे 108 रूपों में पुंजते हैं जैसे गंगाधर, नीलकंठ, नागेश्वर, अर्धनारीश्वर आदि। अर्धनारीश्वर भगवान शिव का एक निर्मल स्वरूप माना गया है, इस रूप में भगवान के साथ माता शक्ति भी हैं। अर्धनारीश्वर स्वरूप का अर्थ होता है आधी स्त्री और आधा पुरुष। भगवान शिव के इस अर्धनारीश्वर स्वरूप के आधे हिस्से में पुरुष रूपी महादेव का वास है तो आधे हिस्से में स्त्री रूपी शिवा यानि शक्ति (माता पार्वती) का वास है। आइए जानते हैं कि भगवान अर्धनारीश्वर की पावन कथा।

शिवपुराण में वर्णित कथा के अनुसार ब्रह्माजी को सृष्टि के निर्माण का कार्य सौंपा गया था,तब तक भगवान शिव ने सिर्फ विष्णुजी और ब्रह्मा जी को ही अवतरित किया था और किसी भी नारी की उत्पति इस धरती पर नहीं हुई थी। जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि के निर्माण का काम शुरू किया,तब उनको ज्ञात हुआ की उनकी ये सारी रचनाएं तो जीवनोपरांत नष्ट हो जाएंगी और हर बार उन्हें नए सिरे से इनका सृजन करना होगा। उनके सामने बहुत ही बड़ी दुविधा आकर खड़ी हो गई थी कि इस तरह से सृष्टि की वृद्धि कैसे होगी। तभी एक आकाशवाणी हुई कि- ‘वे मैथुनी यानी प्रजनन सृष्टि का निर्माण करें,ताकि सृष्टि को बेहतर तरीके से निरंतर संचालित किया जा सके’।

अब ब्रम्हा एक और बड़ी दुविधा में पड़ गए कि आखिर वो मैथुनी सृष्टि का निर्माण करे तो कैसे। काफी सोच-विचार करने के बाद वे भगवान शिव के पास पहुंचे और शिव को प्रसन्न करने के लिए ब्रह्मा जी ने कठोर तप किया और तब भगवान शिव प्रसन्न हुए। इस कथा के अनुसार ब्रह्मा जी के तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने अर्धनारीश्वर स्वरूप में दर्शन दिया। भगवान ने इस स्वरूप में दर्शन दिया तब उनके शरीर के आधे भाग में साक्षात शिव नजर आए और आधे भाग में स्त्री रूपी शिवा यानि शक्ति। ऐसा कहा जाता है कि अपने इस स्वरुप के दर्शन से भगवान शिव ने ब्रह्मा को प्रजननशील प्राणी के सृजन की प्रेरणा दी जिसके बाद ही इस सृष्टि का सृजन संभव हो सका।  उन्होंने ब्रह्मा जी से कहा कि मेरे इस अर्धनारीश्वर स्वरूप के जिस आधे हिस्से में शिव हैं वो पुरुष है और बाकी के आधे हिस्से में जो शक्ति यानी कि स्त्री है।

पुराण के अनुसार आगे उन्होंने कहा कि, आपको स्त्री और पुरुष दोनों की मैथुनी सृष्टि की रचना करनी है,जो प्रजनन के ज़रिए सृष्टि को आगे बढ़ा सके। 

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