मुगलों ने भी किया था कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार, आखिरी सास तक इस्लाम अपनाने को नहीं तैयार हुए गुरु तेग बहादुर

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डेस्क। नौवें सिख गुरु तेग बहादुर का जन्म अमृतसर में 21 अप्रैल को सन 1621 में हुआ था। उनकी माता नानकी और छठे सिख गुरु, गुरु हरगोबिंद थे। तेग बहादुर का विवाह 1632 में करतारपुर में माता गुजरी से हुआ, और बाद में वे अमृतसर के पास बकाला के लिए रवाना हो गए।

गुरु के समय औरंगजेब मुगल बादशाह का शासन था। या तो सरकारी आदेश के माध्यम से या जबरदस्ती से गैर-मुस्लिमों के धर्मांतरण का का सिलसिला जोरो से जारी था।

इतिहासकारों के अनुसार, जब लोगों पर किसी अपराध या दुराचार का आरोप लगाया जाता है, तो अगर वे धर्मांतरण करते हैं तो उन्हें माफ करने की हिदायत दी जाती थी। गुरु तेग बहादुर, जिन्होंने मालवा और माझा के माध्यम से बड़े पैमाने पर यात्रा करना शुरू किया था, पहली बार अधिकारियों के साथ संघर्ष में आए जब उन्होंने पीर और फकीरों की कब्रों पर पूजा करने की परंपरा पर सवाल उठाना शुरू कर दिया।

जैसे ही उनका संदेश फैलने लगा, वर्तमान हरियाणा में जींद के पास धमतान में एक स्थानीय सरदार ने उन्हें ग्रामीणों से राजस्व एकत्र करने के मनगढ़ंत और झूठे आरोप में पकड़ लिया और उन्हें दिल्ली ले गए। बाद में आमेर के राजा राम सिंह, जिनका परिवार लंबे समय से गुरुओं का अनुयायी रहा था। उन्होंने इसमें हस्तक्षेप किया और उन्हें लगभग दो महीने तक अपने घर में रखा।

इसके बाद आनंदपुर साहिब में एक कश्मीरी ब्राह्मण कृपा राम ने गुरु से संपर्क किया, जिन्होंने स्थानीय सरदारों से उनकी सुरक्षा की मांग की। उन्हें जबरदस्ती धर्मांतरण करने के लिए कहा गया था। गुरु ने उनके समूह को उनकी सुरक्षा का आश्वासन दिया और उनसे कहा कि वे मुगलों से कहें कि उन्हें पहले गुरु को बदलने की कोशिश करनी चाहिए।

औरंगजेब ने इसे एक चुनौती समझ लिया। एक जीवनी के अनुसार इसके बाद गुरु स्वयं दिल्ली गए थे जहाँ उन्हें मुगलों ने गिरफ्तार कर लिया।  

आपको बता दें कि, ‘गुरु तेग बहादुर को किसने मारा?’ शीर्षक नाम से प्रकाशित इतिहासकार सरदार कपूर सिंह ने पेपर में लिखा है कि औरंगजेब ने 11 नवंबर, 1675 को गुरु को सार्वजनिक रूप से फांसी देने का आदेश दिया था, जब उन्होंने इस्लाम अपनाने से इनकार कर दिया था।

उनके भाई सती दास जिन्हें जला दिया गया था, और भाई दयाला को उबलते पानी में डाल दिया गया था। उन्हें अंत तक अपना विचार बदलने के लिए कहा गया, लेकिन वे दृढ़ रहे जिसके बाद उनको मार दिया गया।  जहां पर उन्हें मारा गया था वहीं 1784 में, गुरुद्वारा सीस गंज साहिब उस स्थान पर बनाया गया।