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Lok Sabha Elections 2024: बीजेपी-कांग्रेस दोनों के लिए निर्णायक साबित होने वाले हैं लोकसभा चुनाव

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Lok Sabha Elections 2024: अगले साल मई होने वाले लोकसभा चुनाव बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिहाज से निर्णायक साबित होने वाले हैं. अगर इंडिया का गठबंधन फेल होता है तो कांग्रेस का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा. वहीं अगर बीजेपी नेतृत्व वाला एनडीए को मात मिलती है तो बीजेपी और ब्रांड मोदी को तगड़ा झटका लगेगा. 

जिसकी वजह से बीजेपी लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर बेहद संजीदा है. वह अपने सभी कील-कांटे दुरूस्त करने में जुटी हुई है. इसी की एक अहम कड़ी बिहार का जातीय समीकरण है. जिसे साधने में बीजेपी ने अपनी ताकत झोंकनी शुरू कर दी है. 

जातीय समीकरणों में बंटा बिहार
देखा जाए तो बिहार की राजनीति का इतिहास गवाह रहा है यहां कोई मुद्दा चुनावी होता ही नहीं है. यहां सारा चुनाव जाति यानी कास्ट के आधार पर होता है. इसलिए यहां एससी-एसटी का 17 फीसदी वोट बैंक निर्णायक भूमिका में रहता है. पिछली बार नीतीश कुमार और रामविलास पासवान एनडीए के साथ थे. इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता हासिल करने में कोई खास परेशानी नहीं हुई थी. मगर इस बार अब रामविलास पासवान नहीं हैं, जबकि नीतीश कुमार एनडीए का साथ छोड़कर इंडिया के पाले में चले गए हैं. इस कारण बिहार में बीजेपी और एनडीए का जातीय समीकरण कुछ गड़बड़ा रहा है. बीजेपी भी अच्छी तरह जानती है कि बिहार में हिंदू के नाम पर वोट बैंक बटोरा नहीं जा सकता.

चिराग पासवान के पास कितना फीसदी वोट बैंक
बीजेपी ने पिछले लोकसभा चुनाव में बिहार में 40 में से 39 सीटों पर कब्जा किया था. हालांकि उस समय स्थिति दूसरी थी. उस समय नीतीश और रामविलास पासवान जैसे दिग्गज नेता एनडीए के साथ थे. हालांकि, इस बार रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान ने उप चुनाव में बीजेपी का साथ देकर एनडीए के साथ आने के संकेत दे दिए हैं. अगर चिराग पासवान एनडीए के साथ आते हैं तो उनका 7 फीसदी पासवान वोट भी बीजेपी के खाते में आएगा. पासवान वोटों पर चिराग की पकड़ अपने पिता जैसी ही मजबूत है. इसके अलावा उनके साथ कुछ अन्य जातियों के वोट भी आ सकते हैं.

मुकेश सहनी और मल्लाह वोट बैंक
पासवान के बाद एक और बड़ा वोट बैंक मल्लाहों का है. जिस पर इस समय मुकेश सहनी की पकड़ सबसे ज्यादा मजबूत नजर आ रही है. मल्लाह वोट बैंक में बीजेपी का चेहरा रहे अजय निषाद की स्थिति अपने समाज में कमजोर नजर आ रही है. वह अपनी पत्नी को भी चुनाव नहीं जितवा सके थे. इसलिए बीजेपी का रुख मुकेश सहनी की ओर है. मुकेश सहनी को इंडिया गठबंधन ने कोई तवज्जो नहीं दी है. इसलिए उनका बीजेपी की ओर झुकाव लगभग तय माना जा रहा है. इसी के मद्देनजर मुकेश सहनी को बीजेपी ने वाई प्लस सुरक्षा भी दे दी है. मुकेश सहनी के आने से 6 फीसदी का बड़ा वोटबैंक बीजेपी के पाले में आ सकता है. 

जीतन मांझी और मायावती
बिहार में जीतनराम मांझी और उत्तर प्रदेश में मायावती के वोट बैंक में अगर बीजेपी सेंध लगाने में सफल हो जाती है तो एनडीए की सरकार फिर से बन सकती है. मगर यह सबकुछ आसान इसलिए नहीं है, क्योंकि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी अपने करीब 40 साल के राजनीतिक जीवन में 8 बार पाला बदल चुके हैं. इस बार वह 9वीं बार पाला बदलने की फिराक में हैं. उन्हें सत्तासीन रहना पसंद है. वैसे भी मांझी को इंडिया के महागठबंधन ने तवज्जो नहीं दी है. अगर वह पलटते हैं तो एनडीए के खाते में बिहार से 3 फीसदी या उससे अधिक वोट बैंक का इजाफा और हो सकता है.

इस तरह से अकेले बिहार से राजग को 20 फीसद जातिगत वोटों का लाभ मिलने की संभावना है. हालांकि यह सब इतना आसान नहीं है. राजनीति में अंतिम समय में कौन पलटी मार जाए कोई नहीं जानता. वहीं उत्तर प्रदेश में भले ही मायावती पिछली बार की तरह स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ें, लेकिन अगर सरकार बनाने में जरूरत पड़ी तो उनका पलड़ा एनडीए की ओर ही झुकता नजर आएगा. वहीं दलित वोट बैंक को साधने के लिए नीतीश कुमार ने भी एड़ी-चोटी का जोर लगा रखा है. चिराग पासवान को साधने के लिए ललन सिंह को लगा रखा है.

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