अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) ने न्यूयॉर्क की एक संघीय अदालत में अरबपति उद्योगपति गौतम अडानी और अन्य के खिलाफ आपराधिक मामला पूरी तरह से वापस लेने के अपने फैसले का बचाव किया है। विभाग ने शुक्रवार को अदालत में दायर एक 10 पन्नों के जवाब में दावा किया कि पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के प्रशासन ने राजनीतिक कारणों से अडानी को केवल सार्वजनिक रूप से बदनाम करने के उद्देश्य से यह मामला दर्ज किया था। न्याय विभाग ने दलील दी कि भारतीय अधिकारियों ने पहले ही इन आरोपों की जांच की थी और इनमें ‘कार्रवाई योग्य कोई अनियमितता’ नहीं पाई थी।
गौतम अडानी केस: अमेरिकी न्याय विभाग ने किया मुकदमा वापस लेने का बचाव
न्यूयॉर्क के पूर्वी जिले की अमेरिकी जिला अदालत (यूएस डिस्ट्रिक्ट कोर्ट) के जज निकोलस गराउफिस के समक्ष शुक्रवार को यह जवाब दाखिल किया गया। जवाब में अमेरिकी न्याय विभाग ने गौतम अडानी, सागर अडानी, विनीत जैन और पांच अन्य लोगों के खिलाफ दायर अभियोग (इंडाइटमेंट) को स्थायी रूप से वापस लेने की मांग का समर्थन किया।
न्याय विभाग के प्रिंसिपल एसोसिएट डिप्टी अटॉर्नी जनरल आर. ट्रेंट मैककॉट्टर ने अदालत में लिखा कि भारत ने इस मामले से जुड़े कई आरोपों की जांच की है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2026 में जारी कई रिपोर्टों और फैसलों में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि किसी प्रकार की कार्रवाई योग्य अनियमितता नहीं हुई है। मैककॉट्टर ने तर्क दिया कि जिस देश का इस मामले में सबसे अधिक हित जुड़ा हुआ है, उसने भी जांच के बाद यही माना है कि कोई अनुचित कार्य नहीं हुआ।
भारतीय दस्तावेजों में कथित रिश्वतखोरी की जांच का कोई उल्लेख नहीं
अमेरिकी न्याय विभाग ने अपनी दलील के समर्थन में भारत के तीन आधिकारिक फैसले अदालत में संलग्न किए हैं। हालांकि, इन तीनों दस्तावेजों के विश्लेषण से यह बात सामने आई है कि इनमें से किसी ने भी उस कथित रिश्वतखोरी की साजिश की जांच नहीं की थी, जो अमेरिकी अभियोग का मुख्य आधार है।
मैककॉट्टर ने अपनी दलील में यह भी कहा कि अदालत को न्याय विभाग से यह पूछने का अधिकार नहीं था कि उसने मामला वापस लेने का फैसला क्यों किया। उनका कहना था कि आपराधिक मुकदमा शुरू करना या उसे वापस लेना कार्यपालिका के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र का हिस्सा है।
अदालत ने विस्तृत स्पष्टीकरण देने का दिया था निर्देश
यह जवाब जस्टिस गराउफिस के 26 जून के उस आदेश के बाद दाखिल किया गया है, जिसमें उन्होंने न्याय विभाग की अभियोग को तुरंत खारिज करने की मांग को मंजूर करने से इनकार कर दिया था। जज ने न्याय विभाग की मूल याचिका को ‘अत्यंत संक्षिप्त, सामान्य और केवल निष्क्र्यात्मक’ बताया था। उन्होंने अभियोजकों को निर्देश दिया था कि वे अभियोग वापस लेने के हर कारण को विस्तार से स्पष्ट करें और उसके समर्थन में पर्याप्त तथ्यात्मक आधार प्रस्तुत करें।
न्यायाधीश के निर्देश के कारण ही विभाग ने अपने निर्णय के कारण बताने के लिए कार्यपालिका के विशेषाधिकार में केवल सीमित छूट दी है। इस जवाब पर केवल आर. ट्रेंट मैककॉट्टर के ही हस्ताक्षर हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने जानबूझकर न्यूयॉर्क के पूर्वी जिले के अमेरिकी अटॉर्नी या इस मामले को संभालने वाले अभियोजकों से इस पर हस्ताक्षर नहीं कराए, क्योंकि आरोपों को वापस लेने का अंतिम निर्णय उन्होंने ही लिया था।
हस्ताक्षर और बोरिस एप्सटीन की भूमिका पर उठा विवाद
इससे पहले 18 मई को दायर की गई मूल याचिका पर भी केवल मैककॉट्टर का ही नाम था और मामले के किसी अभियोजक के हस्ताक्षर नहीं थे। वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के अनुसार, इससे यह संकेत मिलता है कि अभियोजक इस फैसले से सहमत नहीं थे और इसके दो दिन बाद ही दो अभियोजकों ने खुद को इस मामले से अलग करने की अर्जी दाखिल कर दी थी।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सलाहकार और निजी वकील बोरिस एप्सटीन ने न्याय विभाग में मैककॉट्टर की नियुक्ति का समर्थन किया था। विभाग के भीतर इस बात की चर्चा थी कि एप्सटीन कथित रूप से अडानी समूह की कानूनी रणनीति में भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि, एप्सटीन ने अडानी समूह से किसी भी संबंध या इस मामले में किसी भूमिका से इनकार किया है।
न्याय विभाग की एक प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि मैककॉट्टर की नियुक्ति केवल योग्यता और अनुभव के आधार पर हुई थी। प्रवक्ता ने कहा कि न तो मैककॉट्टर और न ही कार्यवाहक अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लांश ने इस मामले पर एप्सटीन से कोई चर्चा की। अडानी समूह और उसकी अमेरिकी कानूनी फर्म ‘सुलिवन एंड क्रॉमवेल’ ने भी कहा कि एप्सटीन की कंपनी के बचाव में कोई भूमिका नहीं थी।
FAQ:
Q1: अमेरिकी न्याय विभाग ने गौतम अडानी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने का क्या कारण बताया है?
A1: न्याय विभाग ने अपनी दलील में दावा किया है कि पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के प्रशासन ने केवल राजनीतिक कारणों से और गौतम अडानी को सार्वजनिक रूप से बदनाम करने के उद्देश्य से यह मामला दर्ज किया था।
Q2: अमेरिकी कोर्ट में न्याय विभाग द्वारा पेश किए गए भारतीय दस्तावेजों को लेकर क्या विरोधाभास है?
A2: न्याय विभाग ने दावा किया कि भारतीय अधिकारियों ने आरोपों की जांच कर कोई कार्रवाई योग्य अनियमितता नहीं पाई, लेकिन विभाग द्वारा संलग्न किए गए तीनों भारतीय दस्तावेजों में कथित रिश्वतखोरी की साजिश की कोई जांच नहीं की गई थी।
Q3: इस मामले में अमेरिकी न्याय विभाग के भीतर अभियोजकों की असहमति की क्या खबर है?
A3: वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, 18 मई की मूल याचिका पर केवल आर. ट्रेंट मैककॉट्टर के हस्ताक्षर थे और मामले को संभालने वाले अभियोजकों ने हस्ताक्षर नहीं किए थे। इसके दो दिन बाद ही दो अभियोजकों ने खुद को इस मामले से अलग करने की अर्जी दाखिल की थी।











