India Unemployment & Debt Crisis: भारत में बेरोजगारी और घरेलू कर्ज की बढ़ती चिंता के बीच डिजिटल लोन ऐप्स तेजी से छोटे कर्ज बांट रहे हैं। जानिए कैसे लोग कर्ज चुकाने के लिए नया कर्ज लेने को मजबूर हो रहे हैं।
भारत की अर्थव्यवस्था की तस्वीर को सिर्फ GDP, शेयर बाजार या आर्थिक विकास दर से समझना मुश्किल है। आम आदमी के स्तर पर देखें तो दो बड़ी चिंताएं लगातार सामने आ रही हैं—रोजगार का संकट और बढ़ता घरेलू कर्ज। मई 2026 में भारत की कुल बेरोजगारी दर 5.5 फीसदी रही। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, मई में शहरी बेरोजगारी दर 6.4 फीसदी थी, जबकि ग्रामीण बेरोजगारी दर 5.1 फीसदी रही। सरकार ने यह भी कहा कि मई में श्रम बाजार के कुछ संकेतकों में नरमी दिखाई दी।
दूसरी ओर, भारतीय रिजर्व बैंक की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के मुताबिक घरेलू कर्ज GDP के 45.5 फीसदी तक पहुंच चुका था। मार्च 2026 तक कुल घरेलू कर्ज में गैर-आवासीय रिटेल लोन की हिस्सेदारी 58.4 फीसदी रही। यानी समस्या सिर्फ यह नहीं है कि लोगों को पर्याप्त काम मिल रहा है या नहीं। सवाल यह भी है कि जिन लोगों के पास काम है, उनकी आय उनकी जरूरतों और कर्ज की किस्तों का बोझ उठा पा रही है या नहीं।
बेरोजगारी का संकट क्यों चिंता बढ़ा रहा है?
भारत में रोजगार की तस्वीर को समझते समय सिर्फ बेरोजगारी दर देखना पर्याप्त नहीं है। बड़ी संख्या में लोग ऐसे भी हैं जो किसी न किसी काम में लगे हैं, लेकिन उनकी आय इतनी नहीं है कि वे महंगाई, स्वास्थ्य खर्च, शिक्षा, किराया और दूसरी बुनियादी जरूरतों को आसानी से पूरा कर सकें। यही स्थिति लोगों को उधार लेने की तरफ धकेल सकती है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मई 2026 में कुल बेरोजगारी दर 5.5 फीसदी रही। शहरी इलाकों में यह दर 6.4 फीसदी थी। युवाओं के लिए चुनौती और गंभीर है। पढ़ाई पूरी करने के बाद स्थायी और अच्छी आय वाली नौकरी हासिल करना बड़ी संख्या में युवाओं के लिए मुश्किल बना हुआ है। ऐसे में रोजगार की गुणवत्ता, वेतन और नौकरी की स्थिरता भी उतने ही महत्वपूर्ण मुद्दे बन जाते हैं जितना बेरोजगारी का आंकड़ा।
दूसरी तरफ बढ़ रहा है घरेलू कर्ज
रोजगार और आय पर दबाव के बीच घरेलू कर्ज का बढ़ना भी चिंता का विषय है। RBI की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के अनुसार घरेलू कर्ज GDP के 45.5 फीसदी तक पहुंच गया। रिपोर्ट में बताया गया कि घरेलू कर्ज में गैर-आवासीय रिटेल लोन की हिस्सेदारी मार्च 2026 में 58.4 फीसदी रही।
यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि गैर-आवासीय रिटेल कर्ज में पर्सनल लोन, कंज्यूमर क्रेडिट और दूसरी खुदरा उधारी शामिल होती है। इसका मतलब यह नहीं है कि हर घरेलू कर्ज खराब कर्ज है। घर खरीदने, कारोबार या किसी उत्पादक निवेश के लिए लिया गया कर्ज अलग प्रकृति का होता है। असली चिंता तब पैदा होती है जब कर्ज का इस्तेमाल रोजमर्रा के खर्च पूरे करने या पुराने कर्ज की किस्त चुकाने के लिए किया जाने लगे।
डिजिटल लोन ऐप्स ने कर्ज लेना आसान कर दिया
इंटरनेट और स्मार्टफोन के विस्तार ने लोन लेने की प्रक्रिया बेहद आसान बना दी है। जहां पहले बैंक या वित्तीय संस्थान से लोन लेने में दस्तावेज, जांच और समय लगता था, वहीं कई डिजिटल प्लेटफॉर्म कुछ ही मिनटों में छोटे कर्ज उपलब्ध कराने का दावा करते हैं।यही आसानी कई बार जोखिम भी बन जाती है।
Moneylife Foundation की 2026 की एक स्टडी में 110 डिजिटल लेंडिंग एप्लिकेशन और उनके पीछे मौजूद संस्थाओं का अध्ययन किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक FY25-26 में मुख्य रूप से डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए काम करने वाले NBFCs ने करीब 13.2 करोड़ पर्सनल लोन मंजूर किए, जिनकी औसत रकम करीब ₹16,238 थी। छोटे-छोटे कर्ज की इतनी बड़ी संख्या बताती है कि डिजिटल क्रेडिट अब आम उपभोक्ता के लिए तेजी से उपलब्ध हो रहा है।
असली समस्या ब्याज और फीस की है
डिजिटल लोन का सबसे बड़ा खतरा सिर्फ लोन मिलना नहीं है, बल्कि उसकी कुल लागत है। Moneylife Foundation की स्टडी में ऐसे उदाहरण सामने आए जहां 36 फीसदी सालाना ब्याज बताने वाला लोन फीस और छोटी repayment अवधि को जोड़ने के बाद कहीं ज्यादा महंगा पड़ रहा था। कुछ मामलों में 1 फीसदी प्रतिदिन की दर का भी उल्लेख किया गया, जो साधारण वार्षिक गणना में 365 फीसदी के बराबर होती है।
यानी किसी ऐप पर दिखने वाली ब्याज दर और ग्राहक द्वारा वास्तव में चुकाई जाने वाली कुल रकम में बड़ा अंतर हो सकता है। इसीलिए किसी भी डिजिटल लोन को लेने से पहले Annual Percentage Rate, processing fee, late fee और कुल repayment amount को देखना बेहद जरूरी है।
‘कर्ज चुकाने के लिए कर्ज’
सबसे खतरनाक स्थिति तब बनती है जब एक व्यक्ति पुराने लोन की EMI चुकाने के लिए नया लोन लेने लगता है। Moneylife Foundation के मुताबिक, उसने जिन 13 मामलों का विस्तार से विश्लेषण किया, उनमें 11 मामलों में मासिक loan instalments व्यक्ति की बताई गई मासिक आय से ज्यादा थीं। आठ मामलों में किस्तों का बोझ मासिक आय के दोगुने से भी अधिक था।
एक अन्य रिपोर्ट में एक कॉन्ट्रैक्ट वर्कर का उदाहरण दिया गया जिसकी मासिक आय ₹12,000 थी, जबकि छह डिजिटल लोन की कुल मासिक किस्त ₹46,700 तक पहुंच गई थी। ऐसी स्थिति में व्यक्ति के पास दो ही रास्ते बचते हैं—या तो भुगतान रोक दे या फिर नया कर्ज लेकर पुराना कर्ज चुकाए। यही प्रक्रिया धीरे-धीरे Debt Trap यानी कर्ज के जाल में बदल सकती है।
कौन लोग ज्यादा जोखिम में हैं?
Moneylife Foundation की रिपोर्ट में कर्ज के दबाव में आए लोगों की अलग-अलग प्रोफाइल सामने आई हैं। एक समूह में 26 से 45 वर्ष के salaried और informal-sector workers शामिल थे, जिनमें कई मामलों में स्वास्थ्य संबंधी आपात स्थिति के बाद पहला डिजिटल लोन लिया गया और बाद में कई लोन जुड़ते गए।
दूसरे समूह में अपेक्षाकृत अच्छी आय वाले प्रोफेशनल भी शामिल थे। रिपोर्ट में ऐसे लोगों के मामले भी बताए गए जिन्होंने शेयर बाजार में नुकसान के बाद क्रेडिट कार्ड और पर्सनल लोन की सीमाएं इस्तेमाल कर लीं और फिर डिजिटल लोन का सहारा लिया। इससे साफ है कि डिजिटल कर्ज का जोखिम केवल कम आय वाले लोगों तक सीमित नहीं है।
RBI ने क्या नियम बनाए हैं?
डिजिटल लेंडिंग को लेकर RBI ने नियमों को मजबूत किया है। इनमें Key Facts Statement (KFS) जैसे प्रावधान शामिल हैं, जिनका उद्देश्य ग्राहक को लोन की वास्तविक लागत और जरूरी शर्तों की स्पष्ट जानकारी देना है। लेकिन Moneylife Foundation की हालिया स्टडी का तर्क है कि मौजूदा व्यवस्था में अभी भी दो बड़ी चुनौतियां हैं—एक व्यक्ति कितने डिजिटल लोन एक साथ ले सकता है, इस पर प्रभावी सीमा का अभाव और कुल borrowing cost पर व्यापक ceiling का अभाव। यानी सिर्फ लोन लेने की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना काफी नहीं है। यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि ग्राहक अपनी repayment capacity से कई गुना ज्यादा कर्ज न ले पाए।
बैंकिंग सिस्टम फिलहाल मजबूत, लेकिन घरेलू स्तर पर दबाव
RBI की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के मुताबिक मार्च 2026 में भारतीय बैंकों का gross NPA ratio 1.8 फीसदी था। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, RBI ने baseline scenario में बैंकिंग सिस्टम के gross NPA ratio को 2028 तक 2 फीसदी से नीचे रहने का अनुमान जताया है।
इसका अर्थ है कि फिलहाल बैंकिंग सिस्टम व्यापक स्तर पर संकट में नहीं है। लेकिन आम परिवार की वित्तीय स्थिति को केवल बैंकों के NPA से नहीं मापा जा सकता। अगर किसी परिवार की आय का बड़ा हिस्सा EMI में चला जाए, बचत लगातार कम हो और अचानक बीमारी, नौकरी जाने या आय घटने जैसी स्थिति आ जाए, तो परिवार के स्तर पर वित्तीय संकट तेजी से गहरा सकता है।
इस दोहरी मार से कैसे बचा जाए?
आम लोगों के लिए सबसे जरूरी है कि डिजिटल लोन को आसान पैसे के रूप में न देखा जाए।
लोन लेने से पहले इन बातों का ध्यान रखें:
1. कुल repayment amount देखें: सिर्फ ब्याज दर देखकर फैसला न करें। देखें कि पूरे लोन के अंत तक कुल कितनी रकम वापस करनी होगी।
2. KFS जरूर पढ़ें: Key Facts Statement में ब्याज, फीस और अन्य महत्वपूर्ण शुल्क की जानकारी देखें।
3. एक लोन चुकाने के लिए दूसरा लोन न लें: अगर EMI चुकाने के लिए नया कर्ज लेना पड़ रहा है, तो यह खतरे की बड़ी घंटी है।
4. ऐप को अनावश्यक permissions न दें: किसी lending app को contacts, photos या दूसरी निजी जानकारी की access देने से पहले उसकी जरूरत और वैधता जांचें।
5. RBI से जुड़े स्रोतों पर lender की जांच करें: लोन लेने से पहले यह देखना जरूरी है कि संबंधित lender किसी regulated entity के साथ वैध रूप से जुड़ा है या नहीं।
6. EMI को आय के हिसाब से रखें: ऐसा कर्ज न लें जिसकी मासिक किस्त आपकी आय के बड़े हिस्से को खत्म कर दे।
सरकार और नियामकों के सामने बड़ी चुनौती
डिजिटल क्रेडिट को पूरी तरह रोकना समाधान नहीं है। छोटे कर्ज की जरूरत वास्तविक है और डिजिटल माध्यम वित्तीय पहुंच बढ़ाने में मदद कर सकता है। जरूरत है कि सिस्टम को इस तरह बनाया जाए कि आसान कर्ज और महंगा कर्ज एक ही चीज न बन जाएं।
इसके लिए कई स्तरों पर काम जरूरी है—
- एक व्यक्ति की कुल digital borrowing पर प्रभावी निगरानी हो।
- अत्यधिक borrowing cost पर स्पष्ट सुरक्षा व्यवस्था हो।
- फर्जी और अवैध lending apps के खिलाफ लगातार कार्रवाई हो।
- सभी शुल्क और वास्तविक borrowing cost ग्राहक को सरल भाषा में बताई जाए।
- credit bureaus और lenders borrower की repayment capacity को गंभीरता से देखें।
- वित्तीय साक्षरता को बढ़ाया जाए।
- स्वास्थ्य और आपातकालीन खर्चों के लिए सस्ती औपचारिक credit व्यवस्था मजबूत की जाए।
असली समाधान सिर्फ कर्ज पर रोक नहीं, आय बढ़ाना है
भारत में घरेलू कर्ज की समस्या का स्थायी समाधान केवल लोन ऐप्स पर कार्रवाई से नहीं होगा। अगर परिवारों की आय पर्याप्त नहीं बढ़ती और रोजगार के अवसर स्थिर नहीं होते, तो अचानक आने वाला खर्च लोगों को फिर से कर्ज लेने के लिए मजबूर कर सकता है।
इसलिए रोजगार सृजन, बेहतर वेतन, सामाजिक सुरक्षा, सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं और जिम्मेदार डिजिटल क्रेडिट—इन सभी को एक साथ देखना होगा। बेरोजगारी और कर्ज एक-दूसरे को मजबूत कर सकते हैं: आय का संकट कर्ज बढ़ाता है और बढ़ता कर्ज भविष्य की आय को EMI में बांध देता है। यही वजह है कि यह मुद्दा केवल बैंकिंग या वित्तीय क्षेत्र का नहीं है। यह आम परिवार की आर्थिक सुरक्षा और देश के सामाजिक भविष्य से जुड़ा सवाल है।












