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Democracy in India: ‘इंदिरा इज इंडिया’ से लेकर आज के बड़े होर्डिंग्स तक… चापलूसी का नया दौर और मीडिया का सच

Mayank Gaur by Mayank Gaur
June 28, 2026
in प्रदेश खबरें, राष्ट्रीय
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Democracy in India: 'इंदिरा इज इंडिया' से लेकर आज के बड़े होर्डिंग्स तक... चापलूसी का नया दौर और मीडिया का सच
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Democracy in India:  अगर आप शाम के वक्त टीवी पर न्यूज़ चैनल खोलते हैं, तो आपको वहां क्या दिखता है? कुछ लोग जोर-जोर से चिल्ला रहे होते हैं, एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे होते हैं और एंकर किसी एक मुद्दे को सही ठहराने की कोशिश कर रहा होता है। इन बहसों में शोर तो बहुत होता है, लेकिन काम की बात या ‘रोशनी’ बहुत कम नजर आती है।

हाल ही में 25 जून को देश में लगाए गए ‘आपातकाल’ (Emergency 1975) के 50 साल पूरे हुए हैं। इस मौके पर सत्ताधारी पार्टी ने उस काले दौर को याद किया और बताया कि कैसे उस समय लोकतंत्र का गला घोंटा गया था। लेकिन क्या आज हमारा मीडिया और लोकतंत्र पूरी तरह से आजाद है? वरिष्ठ पत्रकार कुमी कपूर ने इस मौजूदा माहौल पर एक बहुत ही बेबाक और सटीक विश्लेषण किया है। आइए, एक दोस्त की तरह बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं कि आज के ‘सेल्फ-सेंसरशिप’ और 1975 की सेंसरशिप में क्या फर्क है।

‘सेल्फ-सेंसरशिप’ क्या है और टीवी बहसों में इतना शोर क्यों है?

साल 1975 के आपातकाल में सेंसरशिप का तरीका बहुत सीधा और सख्त था। अगर कोई पत्रकार सरकार के खिलाफ लिखता था, तो उसे बिना किसी मुकदमे के सीधा जेल में डाल दिया जाता था।

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कुमी कपूर का मानना है कि आज हालात वैसे नहीं हैं। आज आपको सीधा जेल में नहीं डाला जाता, लेकिन पत्रकारों के मन में ‘सत्ता की नाराजगी’ का इतना डर बैठ गया है कि वे खुद ही अपने ऊपर पाबंदियां लगा लेते हैं। इसे ही ‘सेल्फ-सेंसरशिप’ (Self-Censorship) कहते हैं। यानी पत्रकार वह सच लिखने या बोलने से खुद ही पीछे हट जाता है, जिससे सरकार नाराज हो सकती है। यही वजह है कि आज के टीवी चैनल अपना ज्यादातर समय सिर्फ सरकारी नैरेटिव (सरकार की बातों) को आगे बढ़ाने में लगाते हैं और असली मुद्दों पर कोई शांत या काम की बहस नहीं होती।

आज के दौर में सेंसरशिप के नए और मॉर्डन हथियार

अब सवाल यह उठता है कि जब जेल का डर नहीं है, तो फिर मीडिया की आवाज कैसे दबाई जा रही है? आज के दौर में सेंसरशिप के तरीके मॉर्डन और हाईटेक हो गए हैं:

  1. सोशल मीडिया की ट्रोलिंग: अगर कोई पत्रकार सरकार के विचारों से अलग राय रखता है, तो सोशल मीडिया पर उसके खिलाफ एक जहरीली ट्रोलिंग शुरू कर दी जाती है। उसे गालियां दी जाती हैं और देशद्रोही तक कह दिया जाता है।

  2. सरकारी एजेंसियों का डर: असहमत पत्रकारों को डराने के लिए कई बार सरकारी जांच एजेंसियों का इस्तेमाल किया जाता है।

  3. कड़े आईटी नियम: ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ (National Security) का हवाला देकर नए आईटी नियमों (IT Rules) में ऐसे बदलाव किए जा रहे हैं, जिससे डिजिटल मीडिया पर भी शिकंजा कसा जा सके।

आजकल जो मीडिया सलाहकार हैं, वे पत्रकारों से खुलकर बात करने के बजाय किसी पीआर (PR) या विज्ञापन एजेंसी की तरह काम करते हैं, जिनका मकसद सिर्फ सरकार की अच्छी छवि बनाना होता है।

पुराने नेताओं वाला वो ‘संवाद’ अब गायब क्यों है?

एक समय था जब राजनीति में विरोधियों का भी सम्मान होता था। कुमी कपूर याद दिलाती हैं कि आज के मीडिया मैनेजरों को पुराने दौर के नेताओं से, जैसे दिवंगत अरुण जेटली से ‘विनम्रता’ सीखनी चाहिए।

अरुण जेटली जैसे नेता उन पत्रकारों से भी बातचीत का रास्ता खुला रखते थे, जो उनके या उनकी पार्टी के खिलाफ लिखते थे। वे कभी भी पत्रकारों के ‘सोर्स’ (खबर मिलने का जरिया) नहीं काटते थे। लेकिन आज अगर आप सत्ता से असहमत हैं, तो आपसे बातचीत के सारे दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। यह संवाद की कमी लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं है।

क्या राजनीतिक पार्टियों और संस्थाओं में अंदरूनी लोकतंत्र बचा है?

पत्रकारिता के अलावा, राजनीति के अंदर भी ‘लोकतंत्र’ की कमी साफ दिखाई दे रही है। कुमी कपूर ने बताया कि सत्ताधारी पार्टी के भीतर भी अब खुलकर बहस नहीं होती।
बड़े फैसले बिना किसी खास सलाह-मशविरे के लिए जाते हैं। कई बार ऐसे नेताओं को अचानक किसी राज्य का मुख्यमंत्री (CM) बना दिया जाता है, जिनके पास तजुर्बा बहुत कम होता है। इसके अलावा:

  • चुनाव आयोग (Election Commission) जैसी संवैधानिक संस्थाओं की आजादी और निष्पक्षता पर भी सवाल उठ रहे हैं।

  • विधायकों को तोड़कर (दलबदल कराकर) बहुमत हासिल करने की जो राजनीति चल रही है, वह भी लोकतंत्र के लिए गहरी चिंता का विषय है।

चापलूसी का नया दौर: ‘इंदिरा इज इंडिया’ से आज तक क्या बदला?

हम आज आपातकाल के 50 साल पूरे होने पर पुरानी गलतियों को याद कर रहे हैं। उस दौर में कांग्रेस नेता डी.के. बरुआ का एक नारा बहुत मशहूर हुआ था— “इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा” (यानी इंदिरा गांधी ही भारत हैं)। उस समय चापलूसी अपने चरम पर थी।

लेकिन अगर आज हम अपने आसपास नजर दौड़ाएं, तो क्या हालात बहुत बदले हैं? आज भी सड़कों पर बड़े-बड़े होर्डिंग्स और विज्ञापनों में शासकों की जो गैर-जरूरी चापलूसी दिखाई देती है, वह हमें वापस उसी ‘डी.के. बरुआ’ वाले दौर की याद दिलाती है। विडंबना यह है कि जो लोग आपातकाल की बुराई करते हैं, वे अनजाने में उसी तरह की ‘पीआर राजनीति’ को बढ़ावा दे रहे हैं।

कुल मिलाकर बात यह है कि लोकतंत्र की असली ताकत ‘बहस’ और ‘असहमति’ में होती है। जब टीवी पर सिर्फ शोर हो, पत्रकार डर के मारे सच न बोलें और संस्थाएं कमजोर पड़ने लगें, तो यह एक खामोश आपातकाल जैसा ही है। एक मजबूत देश के लिए जरूरी है कि वहां विचारों का खुला बाजार हो, न कि सिर्फ ‘सेल्फ-सेंसरशिप’ की खामोशी।


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Mayank Gaur

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