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Resignation Psychology: चंपत राय का डिलेड रेजिग्नेशन हो या नीट विवाद… जानें सत्ता और नैतिकता के बीच क्यों फंसा है ‘इस्तीफा’

Kavya Bharadwaj by Kavya Bharadwaj
June 28, 2026
in राष्ट्रीय
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Resignation Psychology: चंपत राय का डिलेड रेजिग्नेशन हो या नीट विवाद... जानें सत्ता और नैतिकता के बीच क्यों फंसा है 'इस्तीफा'
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Resignation Psychology: क्या आपको याद है जब हमारे देश में कोई बड़ा ट्रेन हादसा या कोई बड़ा घोटाला होता था, तो उस विभाग का मंत्री नैतिक जिम्मेदारी (Moral Responsibility) लेते हुए तुरंत अपना इस्तीफा दे देता था? लाल बहादुर शास्त्री से लेकर माधवराव सिंधिया तक, ऐसे कई उदाहरण हमारे राजनीतिक इतिहास में दर्ज हैं। लेकिन अगर हम आज की राजनीति को देखें, तो ‘इस्तीफा’ (Resignation) शब्द जैसे डिक्शनरी से गायब सा हो गया है।

हाल ही में नीट (NEET) पेपर लीक का इतना बड़ा विवाद हुआ, बड़े-बड़े रेल हादसे हुए, लेकिन किसी भी शीर्ष मंत्री ने अपनी कुर्सी नहीं छोड़ी। ऐसा क्यों है? क्या नेताओं की नैतिकता खत्म हो गई है? या फिर इसके पीछे सत्ता को ‘मजबूत’ दिखाने का कोई बड़ा पावर गेम (Power Game) है? आइए, एक दोस्त की तरह बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं कि इस्तीफे के पीछे का मनोविज्ञान (Psychology) क्या होता है, ‘डिलेड रेजिग्नेशन’ किसे कहते हैं और कैसे सिस्टम अपने बचाव के लिए ‘बलि का बकरा’ खोज लेता है।

‘इस्तीफा’ आखिर क्या है? (दर्शनशास्त्र की नजर में)

जब हम ‘इस्तीफा’ शब्द सुनते हैं, तो हमें लगता है कि यह सिर्फ एक कागज का टुकड़ा है। लेकिन मशहूर फिलॉसफर (दार्शनिक) जे. पैट्रिक डोबेल के अनुसार, इस्तीफा दरअसल इंसान के ‘अंतर्मन’ और उसके ‘प्रोफेशनल रोल’ के बीच चलने वाला एक भारी युद्ध है।

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इसे ऐसे समझिए— जब आप किसी पद पर बैठे हैं और आपको लगता है कि सिस्टम में कुछ ऐसा हो रहा है जो आपके उसूलों (नैतिकता) के बिल्कुल खिलाफ है, तो आपके अंदर एक घुटन होने लगती है। जब इंसान को लगता है कि वह अपनी नैतिकता से समझौता नहीं कर सकता, तब वह अपनी कुर्सी छोड़ देता है। इसे ‘मोरल एग्जिट’ (Moral Exit) कहते हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि आप सिस्टम के भ्रष्टाचार और गंदगी से खुद को बेदाग अलग कर लेते हैं।

‘अकाउंटेबिलिटी’ बनाम ‘मैं सब ठीक कर दूंगा’ (Fixer Policy)

जब किसी भी संस्था (Institution) में कोई बड़ा फेलियर होता है, तो सबसे पहली जिम्मेदारी टॉप पर बैठे इंसान की बनती है (इसे अकाउंटेबिलिटी कहते हैं)।

लेकिन आजकल एक नया ट्रेंड आ गया है। नेता या अधिकारी इस्तीफा देने के बजाय ‘फिक्सर पॉलिसी’ (Fixer Policy) अपना लेते हैं। वे जनता के सामने आकर कहते हैं— “मैं कहीं नहीं जाऊंगा, मैं इस सिस्टम को ठीक करके दिखाऊंगा।” भले ही उस संस्था का पूरा ढांचा अंदर से सड़ चुका हो, लेकिन कुर्सी छोड़ने के बजाय वे खुद को ‘सिस्टम का तारणहार’ साबित करने की कोशिश करते हैं।

‘डिलेड रेजिग्नेशन’: जब मजबूरी में छोड़नी पड़ती है कुर्सी

कई बार ऐसा होता है कि कोई अधिकारी या नेता अपनी मर्जी से इस्तीफा नहीं देता, बल्कि जब पानी सिर के ऊपर से गुजर जाता है, तब उससे इस्तीफा लिया जाता है। इसे ‘डिलेड रेजिग्नेशन’ (Delayed Resignation) कहते हैं।

उदाहरण के तौर पर, राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े चंपत राय के कथित मामले को ही देख लीजिए। जब मीडिया का दबाव बढ़ता है, पब्लिक ट्रायल शुरू हो जाता है और वह व्यक्ति संस्था के लिए ‘लायबिलिटी’ (बोझ) बन जाता है, तब भारी चर्चाओं के बाद उससे इस्तीफा दिलवाया जाता है। इस तरह के इस्तीफों में इंसान के अंदर कोई ‘नैतिक जागृति’ नहीं होती, यह सिर्फ जनता के गुस्से को शांत करने का एक हथकंडा होता है।

वर्तमान राजनीति: ‘नीट’ पेपर लीक और रेल हादसों पर इस्तीफे क्यों नहीं?

अगर हम हालिया घटनाओं पर नजर डालें, तो देश के लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़े ‘नीट पेपर लीक’ (NEET Paper Leak) मामले पर भारी बवाल हुआ। लेकिन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा नहीं दिया। इसी तरह, पिछले कुछ सालों में देश ने कई बड़े और दर्दनाक रेल हादसे देखे, लेकिन रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव अपनी जगह पर कायम रहे।

सवाल यह है कि इतनी बड़ी त्रासदियों के बाद भी कोई जिम्मेदारी क्यों नहीं ले रहा है?

मोदी सरकार का ‘नो-रेजिग्नेशन’ मॉडल: मैकियावेली का पावर गेम

इस सरकार में इस्तीफे क्यों नहीं होते? इसका जवाब साल 2015 में राजनाथ सिंह के एक बयान में छिपा है, जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘इस सरकार में इस्तीफे नहीं होते।’

राजनीति विज्ञान के महान विचारक मैकियावेली (Machiavelli) का एक बहुत ही मशहूर सिद्धांत है। उनका मानना था कि ‘सत्ता (Power)’ असल में इस बात पर निर्भर करती है कि लोग आपके बारे में क्या ‘परसेप्शन’ (नजरिया) रखते हैं।
अगर एक प्रचंड बहुमत वाली मजबूत सरकार जनता या विपक्ष के दबाव में आकर अपने मंत्रियों के इस्तीफे लेना शुरू कर दे, तो जनता के बीच यह मैसेज जाएगा कि सरकार ‘कमजोर’ है और दबाव में झुक जाती है। अपनी ‘मजबूत और अटल’ छवि को बनाए रखने के लिए ही यह ‘नो-रेजिग्नेशन’ का मॉडल अपनाया गया है।

‘बलि का बकरा’ (Scapegoat) नीति: असली जिम्मेदार कैसे बच निकलते हैं?

अब जब टॉप का मंत्री इस्तीफा नहीं देगा, तो जनता का गुस्सा कैसे शांत होगा? इसके लिए फिलॉसफर रेने जिराड (René Girard) की थ्योरी काम आती है, जिसे ‘बलि का बकरा’ (Scapegoat) नीति कहते हैं।

जिराड के अनुसार, जब सिस्टम फेल हो जाता है और जनता के गुस्से का कोई समाधान नहीं मिलता, तो सिस्टम अपने बचाव के लिए एक ‘बलि का बकरा’ ढूंढ लेता है।
इसे नीट (NEET) मामले से जोड़कर देखिए। जब पेपर लीक पर बवाल बढ़ा, तो शिक्षा मंत्री या किसी बड़े राजनेता पर आंच आने के बजाय नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) के हेड को उनके पद से हटा दिया गया। जनता को लगा कि कार्रवाई हो गई, जबकि हकीकत में यह सिर्फ असली जिम्मेदारी से बचने और एक अधिकारी को ‘बलि का बकरा’ बनाने की चाल थी।

राजनीति में इस्तीफा देना कभी कमजोरी की निशानी नहीं था, बल्कि यह राजनेताओं की ‘अकाउंटेबिलिटी’ (जवाबदेही) का सबसे बड़ा सबूत था। आज जब ‘फिक्सर पॉलिसी’ और ‘बलि का बकरा’ बनाने का ट्रेंड हावी हो गया है, तो एक बात बिल्कुल साफ है— सत्ता की मजबूती दिखाने के खेल में नेताओं की ‘नैतिक जिम्मेदारी’ कहीं बहुत पीछे छूट गई है। क्या आपको लगता है कि बड़े हादसों पर मंत्रियों का इस्तीफा होना चाहिए? अपनी राय जरूर सोचें…..

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Kavya Bharadwaj

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