इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ताजमहल के वैज्ञानिक और स्थानीय सर्वेक्षण की मांग वाली एक याचिका पर केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) से जवाब तलब किया है। जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल की एकल पीठ ने उस याचिका पर नोटिस जारी किया जिसमें दावा किया गया है कि यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल ताजमहल मूल रूप से ‘तेजोमहालय’ नामक भगवान शिव का एक मंदिर था। याचिकाकर्ताओं ने विवाद के निपटारे के लिए एक एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त कर ताजमहल का निरीक्षण व फोटोग्राफी कराने की मांग की है।
यह याचिका मुख्य दीवानी मुकदमे के तहत दायर की गई है, जिस पर हाईकोर्ट अब केंद्र सरकार और एएसआई के जवाब के बाद ही आगे का निर्णय लेगा।
निचली अदालतें दो बार खारिज कर चुकी हैं सर्वे की मांग
यह याचिका ‘भगवान श्री अग्रेश्वर महादेव नागनाथेश्वर विराजमान तेजो महालय मंदिर पैलेस’ की ओर से उनके कानूनी संरक्षक हरि शंकर जैन और अन्य हिंदू श्रद्धालुओं द्वारा दायर की गई है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से एक एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करने की मांग की है जो ताजमहल के उन प्रतिबंधित हिस्सों का निरीक्षण करे और उनकी तस्वीरें ले, जहां आम जनता का प्रवेश वर्जित है।
इससे पहले दो बार निचली अदालतों द्वारा इस मांग को खारिज किया जा चुका है। पहली बार साल 2019 में आगरा की ट्रायल कोर्ट ने और दूसरी बार इसी साल अप्रैल 2026 में पुनरीक्षण (रिवीजन) अदालत ने इस अर्जी को खारिज कर दिया था, जिसके बाद याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट का रुख किया।
कलश, कमल डिजाइन और ‘गौशाला’ का दिया हवाला
ताजा याचिका में दलील दी गई है कि ताजमहल की वास्तुकला और उसके संरचनात्मक ढांचे का दस्तावेजीकरण किया जाना बेहद आवश्यक है, क्योंकि ऐसे ऐतिहासिक तथ्यों को केवल मौखिक बयानों के आधार पर साबित नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि चूंकि स्मारक एएसआई के संरक्षण में है, इसलिए वे उन प्रतिबंधित हिस्सों तक स्वतंत्र रूप से नहीं पहुंच सकते जहाँ उनके कथित ‘हिंदू अतीत’ के प्रमाण मौजूद हैं।
याचिका में विशेष रूप से मुख्य गुंबद के शिखर पर लगे फिनियल (कलशनुमा शिखर), कमल के डिजाइन और एएसआई के दस्तावेजों में कथित तौर पर ‘गौशाला’ के रूप में दर्ज एक संरचना के निरीक्षण और वीडियोग्राफी की मांग की गई है।
पूजा के अधिकार और एएसआई पर पक्षपात का आरोप
ताजमहल को लेकर मूल दीवानी मुकदमा साल 2015 से आगरा की एक अदालत में लंबित है। इसमें यह घोषणा करने की मांग की गई है कि ताजमहल, मुगल सम्राट शाहजहां द्वारा मुमताज महल का मकबरा बनाए जाने से पहले भगवान शिव का मंदिर था। याचिकाकर्ताओं ने ताजमहल परिसर के भीतर हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा-अर्चने करने की अनुमति भी मांगी है।
उनका दावा है कि पूजा का उनका अधिकार संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धर्म की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के रूप में संरक्षित है। इसके साथ ही याचिकाकर्ताओं ने एएसआई पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए कहा है कि मुस्लिम समुदाय को परिसर के भीतर नमाज़ अदा करने की अनुमति देना गैर-कानूनी है।
सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या फैसले का दिया गया हवाला
साल 2019 में निचली अदालत ने यह कहते हुए सर्वे की मांग खारिज की थी कि कमिश्नर नियुक्त करने का कोई ठोस औचित्य नहीं है। वहीं अप्रैल 2026 में पुनरीक्षण अदालत ने फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि याचिकाकर्ता संबंधित संपत्ति की पहचान से जुड़े राजस्व रिकॉर्ड प्रस्तुत करने में विफल रहे हैं और दी गई भूमि का विवरण प्रतिवादियों के दस्तावेजों से मेल नहीं खाता है।
इसके खिलाफ हाईकोर्ट में दलील देते हुए याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के साल 2019 के ऐतिहासिक अयोध्या फैसले का हवाला दिया है। याचिका में कहा गया है कि सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश 26, नियम 9 के तहत दीवानी अदालतों को यह अधिकार है कि जहाँ तथ्यात्मक विवाद स्पष्ट करने के लिए स्थानीय जांच आवश्यक हो, वहाँ कमिश्नर नियुक्त किया जाए। फिलहाल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिका के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी न करते हुए केवल केंद्र और एएसआई से जवाब मांगा है।
FAQ:
Q1: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ताजमहल के सर्वे की मांग को लेकर क्या आदेश दिया है?
A1: जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल की एकल पीठ ने याचिका पर केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को नोटिस जारी कर उनका जवाब मांगा है। अदालत ने फिलहाल याचिका के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है।
Q2: याचिकाकर्ताओं ने ताजमहल के भीतर किन हिंदू प्रतीकों और संरचनाओं के सर्वे की मांग की है?
A2: याचिकाकर्ताओं ने मुख्य गुंबद के शिखर पर लगे फिनियल (कलशनुमा शिखर), कमल के डिजाइन और एएसआई के दस्तावेजों में कथित तौर पर ‘गौशाला’ के रूप में दर्ज एक संरचना के निरीक्षण और फोटोग्राफी की मांग की है।
Q3: निचली अदालतों ने ताजमहल के वैज्ञानिक सर्वे की इस मांग को पहले क्यों खारिज कर दिया था?
A3: निचली अदालतों (2019 में ट्रायल कोर्ट और अप्रैल 2026 में पुनरीक्षण अदालत) ने इसे यह कहते हुए खारिज किया था कि एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करने का कोई औचित्य नहीं है और याचिकाकर्ता विवादित संपत्ति के सही राजस्व रिकॉर्ड और विवरण प्रस्तुत करने में विफल रहे हैं।












