उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में पुलिस की एक बड़ी और गंभीर लापरवाही का मामला सामने आया है, जहां नाम की गड़बड़ी के चलते लोनी बॉर्डर पुलिस ने एक 56 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर नरेंद्र सिंह को गलत तरीके से गिरफ्तार कर लिया। पीड़ित नरेंद्र सिंह का आरोप है कि पुलिस ने उन्हें एक गैर-जमानती मामले में असली आरोपी नरेंद्र कुमार समझकर 23 जून 2026 की रात को उनके घर से उठाया, 18 घंटे से अधिक समय तक हवालात में रखा और गंभीर रूप से प्रताड़ित व मारपीट की। पीड़ित ने अब इस बर्बरता के खिलाफ गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) का दरवाजा खटखटाया है।
नाम की गड़बड़ी के कारण हवालात में गुजारे 18 घंटे
गाजियाबाद के शालीमार गार्डन इलाके में रहने वाले 56 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर नरेंद्र सिंह को लोनी बॉर्डर थाने की पुलिस ने 23 जून की रात करीब 11:30 बजे उनके घर से उठाया था। पुलिस के पास साल 1999 के एक पुराने गैर-जमानती वारंट के तहत ‘नरेंद्र कुमार’ नाम के एक आरोपी को गिरफ्तार करने का आदेश था। पुलिस ने बिना पूरी जांच-पड़ताल किए केवल नाम के पहले हिस्से की समानता के आधार पर नरेंद्र सिंह को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें रातभर हवालात में बंद रखा।
पीड़ित का आरोप: पुलिस ने की बर्बरता और मांगी रिश्वत
पीड़ित नरेंद्र सिंह ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि हवालात में उनके साथ बेहद अमानवीय व्यवहार किया गया। उन्होंने पुलिस अधिकारियों को अपना आधार कार्ड, पैन कार्ड और अन्य पहचान पत्र दिखाए और स्पष्ट किया कि उनका नाम नरेंद्र सिंह है और उनके पिता का नाम दिवंगत सुखबीर सिंह है, जबकि वारंट में सुखपाल के बेटे नरेंद्र कुमार का नाम था। इसके बावजूद पुलिस ने उनकी एक न सुनी।
मधुमेह (डायबिटीज) और उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) के मरीज नरेंद्र सिंह को रातभर जरूरी दवाएं भी नहीं दी गईं। पीड़ित का आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने उन्हें बेल्ट और डंडों से बुरी तरह पीटा, जिससे उनकी पीठ और पैरों पर गंभीर चोटों के निशान आ गए। जब उनके परिवार वाले पहचान पत्र लेकर थाने पहुंचे, तो पुलिस ने उन्हें छोड़ने के बदले 50,000 रुपये की रिश्वत की मांग की।
खुलासा होने पर माफी की जगह दी केस दर्ज करने की धमकी
पुलिस को अपनी गंभीर गलती का अहसास तब हुआ जब अदालत के क्लर्क और एक वरिष्ठ अधिकारी ने वारंट में दर्ज पिता के नाम और पते का मिलान किया। वारंट के अनुसार, असली आरोपी का नाम नरेंद्र कुमार, पिता का नाम सुखपाल था और वह लोनी का निवासी था, जबकि पीड़ित नरेंद्र सिंह के पिता का नाम सुखबीर सिंह था और वे शालीमार गार्डन में रहते थे।
अपनी गंभीर गलती सामने आने के बाद भी पुलिसकर्मियों ने पीड़ित से माफी मांगने के बजाय उन्हें और उनके परिवार को धमकाना शुरू कर दिया। पीड़ित ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उन्हें धमकी दी कि यदि उन्होंने इस घटना की शिकायत उच्चाधिकारियों या मीडिया से की, तो उन्हें ड्रग्स या अवैध हथियारों के झूठे मामले में फंसाकर जेल भेज दिया जाएगा।
इस खौफनाक अनुभव के बाद, नरेंद्र सिंह ने गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर अजय कुमार मिश्रा और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) से न्याय की गुहार लगाई है। गाजियाबाद पुलिस ने इस मामले की आंतरिक जांच के आदेश दिए हैं, जिसका नेतृत्व शालीमार गार्डन के एसीपी (ACP) कर रहे हैं, हालांकि खबर लिखे जाने तक आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कोई प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं की गई थी।
FAQ:
Q1: गाजियाबाद की लोनी बॉर्डर पुलिस ने नरेंद्र सिंह को किस कारण से गिरफ्तार किया था?
A1: पुलिस ने साल 1999 के एक गैर-जमानती वारंट के तहत ‘नरेंद्र कुमार’ नाम के एक आरोपी के बदले नाम की समानता की गड़बड़ी के कारण ‘नरेंद्र सिंह’ को गलत तरीके से गिरफ्तार किया था।
Q2: पीड़ित नरेंद्र सिंह ने हवालात में पुलिस पर क्या आरोप लगाए हैं?
A2: पीड़ित ने आरोप लगाया है कि पहचान दस्तावेज दिखाने के बावजूद उन्हें 18 घंटे हवालात में रखा गया, मधुमेह व बीपी की दवाएं नहीं दी गईं, बेल्ट व डंडों से बुरी तरह पीटा गया, और परिवार से रिहाई के बदले 50,000 रुपये की रिश्वत मांगी गई।
Q3: इस गंभीर लापरवाही का खुलासा होने के बाद पुलिस ने क्या कदम उठाया?
A3: गलती का पता चलने पर पुलिस ने पीड़ित से माफी मांगने के बजाय उन्हें और उनके परिवार को शिकायत करने या मीडिया में जाने पर ड्रग्स और अवैध हथियारों के झूठे मामले में फंसाने की धमकी दी। मामले की आंतरिक जांच फिलहाल एसीपी शालीमार गार्डन कर रहे हैं।













