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‘अब दिल्ली वाले तय करेंगे कि मेरे घर में चूल्हा जलेगा या नहीं’, नरेगा के नए विकल्प ‘वीबी-जी राम जी’ पर उठ रहे सवाल

JS Team by JS Team
July 7, 2026
in राजस्थान, राष्ट्रीय
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'अब दिल्ली वाले तय करेंगे कि मेरे घर में चूल्हा जलेगा या नहीं', नरेगा के नए विकल्प 'वीबी-जी राम जी' पर उठ रहे सवाल
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दक्षिणी राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं के बीच नरेगा के स्थान पर प्रस्तावित ‘वीबी-जी राम जी’ (विकसित भारत-ग्रामीण रोज़गार और आजीविका मिशन) अधिनियम को लेकर गहरी आशंकाएं पैदा हो गई हैं। सामने आई एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्षों से नरेगा (MGNREGA) के जरिए वित्तीय आत्मनिर्भरता और सामाजिक पहचान हासिल करने वाली महिलाओं को डर है कि नई व्यवस्था से काम मांगने के उनके लोकतांत्रिक अधिकार और स्थानीय पंचायत की जवाबदेही काफी कमजोर पड़ जाएगी।

महिलाओं के लिए केवल मजदूरी नहीं, बल्कि सशक्तिकरण का जरिया है नरेगा

दक्षिणी राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुषों का बड़े पैमाने पर पलायन होता है। साल 2014 के एक राज्य-स्तरीय अध्ययन के अनुसार, इस क्षेत्र के लगभग 56.6 प्रतिशत परिवारों में कम से कम एक पुरुष प्रवासी है। ऐसे में घरों की आजीविका और श्रम की बड़ी जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर टिकी है। ‘उजाला संगठन’ से जुड़ी हजारों महिलाएं नरेगा के जरिए न केवल रोजगार पा रही हैं, बल्कि पहली बार घूंघट और चारदीवारी से बाहर निकलकर पंचायतों में अपनी बात रखना, सरपंच व सचिवों से सीधे सवाल पूछना और जवाबदेही मांगना सीख रही हैं।

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वर्ष 2016-17 में डूंगरपुर जिले की एक पंचायत में जब लगभग 200 महिलाओं से नरेगा आवेदन के लिए गैर-कानूनी तरीके से 50 रुपये मांगे जा रहे थे, तब महिलाओं ने इसका सामूहिक विरोध किया और वह राशि वापस दिलवाई। यह केवल वित्तीय जीत नहीं थी, बल्कि स्थानीय प्रशासन पर उनकी सामूहिक पकड़ का प्रमाण था। नरेगा के जरिए मिली यह ताकत अब उन्हें पंचायत बैठकों में आंगनवाड़ी, राशन, स्कूल, सड़क, आधार कार्ड और पेंशन जैसी गंभीर समस्याओं पर भी खुलकर बोलने का साहस देती है।

श्रम बाजार में मोलभाव करने की बढ़ी ताकत

नरेगा ने न केवल महिलाओं को वित्तीय स्वतंत्रता दी है, बल्कि स्थानीय श्रम बाजार में उनकी मोलभाव करने की क्षमता को भी काफी मजबूत किया है। कोदार गांव की संगठन लीडर किरण बाई (बदला हुआ नाम) कहती हैं, “नरेगा का पैसा आवे, तो खुसी मले, नरेगा न चाले, तो पैसा कोणी आए।”

इस योजना से मिलने वाला पैसा महिलाओं को अपने निजी खर्चों, बच्चों की पढ़ाई और घरेलू जरूरतों से जुड़े फैसले लेने का आत्मविश्वास देता है। इसके साथ ही, स्थानीय काम के दौरान वे ठेकेदारों या मालिकों से न्यूनतम सम्मानजनक मजदूरी के लिए मोलभाव कर पाती हैं। एक सामाजिक कार्यकर्ता ने बताया कि महिलाएं अब बेहिचक कह देती हैं कि जब उन्हें नरेगा में 200-250 रुपये आसानी से मिल रहे हैं, तो वे निजी कामों में इससे कम मजदूरी पर काम नहीं करेंगी।

सरकारी योजनाओं तक पहुंच और मानसिक संबल का आधार

ग्रामीण क्षेत्रों में नरेगा केवल आर्थिक उपार्जन का माध्यम नहीं है। यहाँ होने वाले काम के स्थलों (वर्कसाइट्स) का महिलाओं के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य से भी गहरा नाता है। घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर वे यहाँ अपनी सहेलियों के साथ हंसी-मजाक करती हैं, रोजमर्रा के दुख-सुख साझा करती हैं और तनाव मुक्त होती हैं।

इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों में कई महिलाओं के लिए नरेगा में 90 दिन काम करने का रिकॉर्ड ही ‘भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार अधिनियम’ (BOCW Act) के तहत पंजीकरण का आधार बनता है, जिससे उन्हें छात्रवृत्ति, मातृत्व लाभ और अन्य सरकारी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का सीधा लाभ मिल पाता है।

‘वीबी-जी राम जी’ को लेकर ग्रामीण महिलाओं के मन में गहरा डर

नरेगा की तुलना में नए प्रस्तावित ‘वीबी-जी राम जी’ (विकसित भारत-ग्रामीण रोज़गार और आजीविका मिशन) अधिनियम को लेकर महिलाओं के मन में कई बड़ी आशंकाएं हैं। उन्हें डर है कि यदि काम की मांग करने, काम के चयन और स्थानीय स्तर पर जवाबदेही तय करने की मौजूदा प्रक्रियाएं कमजोर हुईं, तो पंचायतों से उनका वर्षों पुराना लोकतांत्रिक संबंध टूट जाएगा।

महिलाओं को सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि इस नई व्यवस्था में काम का बजट, प्राथमिकताओं का निर्धारण और क्रियान्वयन से जुड़े फैसले स्थानीय स्तर के बजाय केंद्र द्वारा लिए जाएंगे। साबला क्षेत्र की संगठन लीडर गौरी (बदला हुआ नाम) अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहती हैं, “अब दिल्ली वाले तय करेंगे कि मेरे घर में चूल्हा जलेगा या नहीं।” महिलाओं को डर है कि यदि स्थानीय स्तर पर काम सीमित हुआ, तो उन्हें फिर से असंगठित निजी क्षेत्रों में बिना किसी मोलभाव के अत्यंत कम मजदूरी पर काम करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

FAQ:
Q1: दक्षिणी राजस्थान में आजीविका के मामले में महिलाओं पर निर्भरता अधिक क्यों है?
A1: साल 2014 के एक राज्य-स्तरीय अध्ययन के अनुसार, दक्षिणी राजस्थान के लगभग 56.6 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों में कम से कम एक पुरुष रोजगार की तलाश में पलायन (प्रवास) करता है, जिसके कारण परिवारों की आजीविका मुख्य रूप से महिलाओं के श्रम पर निर्भर है।

Q2: ग्रामीण महिलाओं के लिए नरेगा का काम सामाजिक सुरक्षा और अधिकारों का जरिया कैसे बनता है?
A2: नरेगा के तहत 90 दिनों के काम का रिकॉर्ड ही महिलाओं के लिए ‘भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार अधिनियम’ (BOCW Act) के तहत पंजीकरण, छात्रवृत्ति और मातृत्व लाभ जैसी अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं तक पहुंचने का मुख्य जरिया बनता है।

Q3: ग्रामीण महिलाएं प्रस्तावित ‘वीबी-जी राम जी’ अधिनियम से क्यों आशंकित हैं?
A3: महिलाओं को डर है कि नए कानून से काम मांगने का अधिकार, काम का चयन और स्थानीय पंचायत की जवाबदेही कमजोर होगी, तथा निर्णय लेने की प्रक्रिया का पूरी तरह से केंद्रीकरण हो जाएगा।

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