UP Politics: उत्तर प्रदेश की राजनीति और खेती-किसानी का बहुत पुराना और गहरा नाता रहा है। यूपी में सरकार किसी की भी हो, बिना किसानों के समर्थन के सत्ता की कुर्सी तक पहुंचना नामुमकिन है। जब भी चुनाव आते हैं या नीतियों की बात होती है, तो किसानों के मुद्दे सबसे ऊपर आ जाते हैं।
आज हम आपको राजनीति के एक ऐसे ही पुराने पन्ने की तरफ ले जा रहे हैं। बात है साल 2016-17 की, जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (SP) की सरकार थी और उन्होंने इस पूरे साल को ‘किसान वर्ष’ (Kisan Varsh) घोषित किया था। समाजवादी पार्टी का हमेशा से यह दावा रहा है कि उत्तर प्रदेश का असली विकास तभी हो सकता है, जब गांव में बैठा किसान आर्थिक रूप से मजबूत होगा। आइए, एक दोस्त की तरह बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं कि उस ‘किसान वर्ष’ में सरकार ने किसानों के लिए बजट में क्या-क्या खास प्रावधान किए थे और उन योजनाओं का असल मकसद क्या था।
2016-17: जब यूपी में मना ‘किसान वर्ष’
समाजवादी पार्टी की सरकार का मानना था कि राज्य की इकॉनमी (अर्थव्यवस्था) की रीढ़ की हड्डी किसान ही हैं। इसी सोच के साथ 2016-17 के बजट को पूरी तरह से किसानों पर केंद्रित किया गया था। इस ‘किसान वर्ष’ का मुख्य उद्देश्य खेती को घाटे के सौदे से निकालकर एक मुनाफे वाले काम में बदलना था, ताकि किसान को अपनी फसल का सही दाम मिल सके और उसे खेती करने में कोई आर्थिक परेशानी न आए।
राहत और बजट: गन्ने के बकाए से लेकर बीमे तक का गणित
यूपी के किसानों (खासकर पश्चिमी यूपी) की सबसे बड़ी समस्या हमेशा से गन्ने का बकाया भुगतान रही है। किसान अपनी फसल मिलों को दे आते हैं, लेकिन पैसे के लिए उन्हें महीनों इंतजार करना पड़ता है।
-
गन्ना किसानों के लिए: इस समस्या को दूर करने के लिए समाजवादी सरकार ने उस साल के बजट में गन्ना किसानों के मूल्य भुगतान के लिए 1,336 करोड़ रुपये का एक बहुत बड़ा और विशेष प्रावधान किया था।
-
दुर्घटना बीमा: खेती करते समय कई बार हादसों का डर रहता है। ऐसे में किसान के परिवार को सुरक्षा देने के लिए ‘किसान दुर्घटना बीमा योजना’ में 240 करोड़ रुपये डाले गए थे।
-
सूखे से राहत: उस समय जिन इलाकों में सूखा पड़ा था, वहां के किसानों को ‘राज्य राहत कोष’ से सीधे आर्थिक मदद दी गई और उनकी बर्बाद हुई फसल की भरपाई करने का काम भी किया गया।
तकनीक और बाज़ार: किसानों की जेब में सीधा पैसा पहुंचाने की पहल
सरकारी योजनाओं का पैसा अक्सर बिचौलियों की जेब में चला जाता था। इसे रोकने के लिए सपा सरकार ने कृषि और किसान कल्याण से जुड़े सभी विभागों को ‘डिजिटल’ कर दिया। इस डिजिटलीकरण (Digitization) का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि योजनाओं की ऑनलाइन निगरानी शुरू हो गई और पैसा पारदर्शी तरीके से सीधे किसानों तक पहुंचने लगा।
इसके अलावा, किसान की सबसे बड़ी शिकायत होती है कि उसे अपनी फसल का सही दाम नहीं मिलता। इसके समाधान के लिए सरकार ने 8 बड़े शहरों— लखनऊ, सैफई, मैनपुरी, बहराइच, कासगंज, झांसी, कन्नौज और हापुड़ में नई ‘किसान मंडियों’ (किसान बाज़ारों) के निर्माण की शुरुआत की। मकसद साफ था कि किसान अपनी उपज सीधे बाजार में बेचे और बिचौलियों का खेल खत्म हो।
खेती के लिए 93 हजार करोड़ का कर्ज और सोलर पंप की सुविधा
खेती के समय पर बीज, अच्छी खाद (उर्वरक) और ट्रैक्टर जैसे उपकरणों की जरूरत होती है। कई बार पैसे न होने के कारण किसान समय पर बुवाई नहीं कर पाता।
इसे ध्यान में रखते हुए सरकार ने उस साल 93,212 करोड़ रुपये के ‘फसल ऋण’ (Crop Loan) बांटने का एक बहुत बड़ा टारगेट सेट किया था।
वहीं, सिंचाई के लिए जो किसान महंगे डीजल वाले पंप का इस्तेमाल करते थे, उन पर डीजल का भारी खर्च पड़ता था। सरकार ने इस खर्च को कम करने और पर्यावरण को बचाने के लिए खेतों में ‘सौर ऊर्जा’ (Solar Energy) से चलने वाले फोटोवोल्टिक पंप लगाने की योजना शुरू की। इससे किसानों की डीजल पर निर्भरता काफी कम हो गई।
एग्रो-जंक्शन: युवाओं और आधुनिक खेती को जोड़ने का प्लान
खेती को सिर्फ पुराने तरीकों तक सीमित न रखकर, इसे आधुनिक (Modern) बनाने के लिए युवाओं को जोड़ना जरूरी था।
इसके लिए पूरे प्रदेश में 1,000 से ज्यादा ‘एग्रो-जंक्शन’ (Agro-junctions) खोलने की योजना बनाई गई। इन एग्रो-जंक्शनों को कृषि की पढ़ाई कर चुके प्रशिक्षित युवाओं (उद्यमियों) को सौंपा गया। इससे एक तीर से दो निशाने लगे— पहला, युवाओं को अपने ही इलाके में रोजगार मिला, और दूसरा, आम किसानों को आधुनिक खेती की सही ट्रेनिंग और जानकारी मिलने लगी।












