Mumbai News: अगर आप मुंबई में रहते हैं या वहां कभी घूमने गए हैं, तो आपने देखा होगा कि वहां की सड़कों पर मौजूद दुकानों के नाम अब बड़े-बड़े अक्षरों में मराठी (देवनागरी लिपि) में लिखे नजर आते हैं। यह कोई इत्तेफाक नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक कड़ा नियम और बीएमसी (BMC) की सख्त कार्रवाई है।
हाल ही में महाराष्ट्र विधानसभा में भी यह मुद्दा काफी गरमाया रहा। विधायक संतोष दानवे ने जब सरकार से पूछा कि मुंबई में ‘मराठी साइनबोर्ड’ वाले नियम का कितना पालन हो रहा है, तो राज्य के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने इसका पूरा लिखित हिसाब-किताब पेश कर दिया। आइए, एक दोस्त की तरह बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर यह नियम क्या है, बीएमसी ने अब तक कितनी दुकानों पर कार्रवाई की है और जिन लोगों ने नियम नहीं माना, उनसे कितना जुर्माना वसूला गया है।
क्या है ‘मराठी साइनबोर्ड’ का पूरा मामला?
अगर आपको लगता है कि दुकानों पर मराठी भाषा में बोर्ड लगाना सिर्फ एक राजनीतिक मांग है, तो आप गलत हैं। यह अब एक सख्त कानून बन चुका है।
उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने विधानसभा में साफ किया कि मुंबई में हर दुकान और व्यावसायिक प्रतिष्ठान के बाहर मराठी (देवनागरी लिपि) में साइनबोर्ड लगाना कानूनन जरूरी है। इतना ही नहीं, देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने भी 25 सितंबर 2023 को सख्त निर्देश दिए थे कि इस नियम का हर हाल में पालन होना चाहिए। नियम यह भी कहता है कि मराठी में लिखे गए अक्षरों का साइज किसी भी दूसरी भाषा (जैसे अंग्रेजी) से छोटा नहीं होना चाहिए।
बीएमसी (BMC) का एक्शन: 10 लाख से ज्यादा दुकानों की हुई चेकिंग
जब नियम बन गया, तो बीएमसी ने इसे लागू करवाने के लिए कमर कस ली। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, नवंबर 2023 से लेकर 4 जून 2026 तक बीएमसी की टीमों ने पूरे मुंबई में 10 लाख से ज्यादा दुकानों और प्रतिष्ठानों का मुआयना (निरीक्षण) किया।
अगर हम मुंबई की मुख्य सड़कों (Main Roads) की बात करें, तो वहां कुल 2,00,067 दुकानों की चेकिंग की गई। अच्छी बात यह रही कि इनमें से 1,93,747 दुकानों पर मराठी में नामपट्ट (साइनबोर्ड) बिल्कुल सही लगे मिले। लेकिन, 6,320 दुकानें ऐसी थीं जिन्होंने इस नियम को हल्के में लिया था। बीएमसी ने तुरंत इन दुकानों के खिलाफ कार्रवाई का प्रस्ताव तैयार कर लिया।
3 करोड़ रुपये से ज्यादा का वसूला गया जुर्माना
नियम तोड़ना दुकानदारों को काफी महंगा पड़ा है। सरकार ने विधानसभा में जुर्माने का जो आंकड़ा पेश किया, वह हैरान करने वाला है:
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जुर्माना: 3,861 प्रतिष्ठानों से नियम तोड़ने के एवज में 1.95 करोड़ रुपये से ज्यादा का जुर्माना वसूला गया है।
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कंपाउंडिंग फीस: 1,003 दुकानदारों ने अपनी गलती मानते हुए 1.02 करोड़ रुपये की कंपाउंडिंग फीस (समझौता शुल्क) भरकर अपना मामला वहीं रफा-दफा कर लिया।
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कोर्ट केस: इसके बावजूद, 1,456 मामले ऐसे हैं जो अभी भी अदालतों में लंबित (Pending) हैं और उन पर सुनवाई चल रही है।
कार्रवाई में क्यों हो रही है देरी? (अधिकारियों की कमी का सच)
इतने बड़े शहर में चेकिंग करना कोई आसान काम नहीं है। विधानसभा में जब यह सवाल उठा कि क्या बीएमसी के पास कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त लोग हैं? तो सरकार ने बहुत ही ईमानदारी से अपनी कमी मान ली।
सरकार ने बताया कि इस काम के लिए 121 अधिकारियों के पद स्वीकृत हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि फिलहाल सिर्फ 53 अधिकारी ही काम कर रहे हैं। बाकी के 68 पद अभी खाली पड़े हैं। हालांकि, सरकार ने भरोसा दिलाया है कि इन खाली पदों को भरने की प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में है और जल्द ही नई भर्तियां पूरी कर ली जाएंगी।
आगे क्या? (जागरूकता और विशेष अभियान)
बीएमसी का मकसद सिर्फ चालान काटना नहीं है, बल्कि लोगों को नियम के प्रति जागरूक करना भी है। इसी कड़ी में 14 मई से 4 जून 2026 के बीच पूरे शहर में एक ‘विशेष जांच अभियान’ चलाया गया था। इसके साथ ही, दुकानदारों को यह समझाने के लिए ‘जनजागरण अभियान’ भी लगातार चलाया जा रहा है कि वे अपनी मर्जी से ही मराठी में बोर्ड लगा लें, ताकि उन्हें किसी भी तरह के जुर्माने या कोर्ट-कचहरी के चक्करों से बचाया जा सके।













