पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) एस.वाई. कुरैशी ने मतदाता पहचान पत्र (वोटर आईडी) को आधार से जोड़ने और मतदाता सत्यापन के लिए इसके इस्तेमाल को लेकर गंभीर चिंताएं जताई हैं। अपने एक विशेष लेख में कुरैशी ने स्पष्ट किया कि आधार कार्ड किसी भी व्यक्ति की ‘नागरिकता का प्रमाण’ नहीं है, बल्कि यह केवल पहचान और पते का प्रमाण है। उन्होंने आगाह किया कि यदि बिना उचित भौतिक सत्यापन के केवल डिजिटल आधार को ही वोटर लिस्ट के लिए मुख्य फिल्टर माना गया, तो इससे गैर-नागरिकों के नाम मतदाता सूची में शामिल होने और वास्तविक भारतीय नागरिकों के मताधिकार से वंचित होने का गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।
आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं, कानूनन गैर-नागरिकों को भी मिलता है यह कार्ड
यूआईडीएआई (UIDAI) के नियमों के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जो भारत में पिछले 12 महीनों के दौरान 182 दिन या उससे अधिक समय से रह रहा है, वह आधार कार्ड के लिए आवेदन कर सकता है। इसमें विदेशी नागरिक और शरणार्थी भी शामिल हो सकते हैं। इसलिए आधार केवल एक ‘विशिष्ट पहचान पत्र’ और पते का प्रमाण है, नागरिकता का नहीं।
संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत भारत में मतदान का अधिकार केवल और केवल देश के वैध नागरिकों के पास ही है। ऐसे में, यदि आधार को ही मतदाता सूची तैयार करने या उसे सत्यापित करने का एकमात्र आधार मान लिया गया, तो देश के लोकतांत्रिक ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।
वोटर आईडी को आधार से जोड़ने के तकनीकी और लोकतांत्रिक जोखिम
चुनाव कानून (संशोधन) अधिनियम, 2021 के तहत सरकार ने मतदाता पहचान पत्र को आधार से जोड़ने की दिशा में कदम बढ़ाया था। हालांकि, कुरैशी का तर्क है कि इसे अनिवार्य बनाना तकनीकी और लोकतांत्रिक दृष्टि से बेहद जोखिम भरा है। बायोमेट्रिक त्रुटियों, नाम की स्पेलिंग में अंतर या तकनीकी गड़बड़ी के कारण लाखों वास्तविक भारतीय नागरिकों के नाम मतदाता सूची से अचानक गायब होने (वोटर डिलीशन) का खतरा रहता है।
इसके साथ ही, यदि किसी विदेशी नागरिक का आधार कार्ड बना हुआ है और वह बिना किसी स्वतंत्र जांच के सीधे वोटर आईडी से जुड़ जाता है, तो देश की सुरक्षा और संप्रभुता के लिए गंभीर स्थिति पैदा हो जाएगी।
निर्वाचन आयोग की अपनी स्वतंत्र सत्यापन प्रणाली को मजबूत रखने की जरूरत
भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के पास जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत मतदाता सूची तैयार करने और उसके सत्यापन की एक बेहद मजबूत, स्वतंत्र और पारदर्शी प्रणाली पहले से मौजूद है। इसमें बूथ स्तर के अधिकारियों (BLOs) द्वारा घर-घर जाकर किया जाने वाला भौतिक सत्यापन, आपत्तियां आमंत्रित करने के लिए मतदाता सूचियों का सार्वजनिक प्रदर्शन और राजनीतिक दलों की भागीदारी शामिल है।
इस जमीनी और पारदर्शी सत्यापन प्रणाली को किसी भी डिजिटल डेटाबेस से रिप्लेस नहीं किया जाना चाहिए। वोटर आईडी को आधार से जोड़ने की प्रक्रिया को पूरी तरह से स्वैच्छिक रखा जाना चाहिए, और किसी भी परिस्थिति में इसका उपयोग वास्तविक नागरिकों को उनके सबसे बड़े लोकतांत्रिक अधिकार यानी मताधिकार से वंचित करने के लिए नहीं होना चाहिए।
FAQ:
Q1: पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी के अनुसार आधार कार्ड को नागरिकता का प्रमाण क्यों नहीं माना जा सकता?
A1: यूआईडीएआई (UIDAI) के नियमों के अनुसार, भारत में पिछले 12 महीनों में 182 दिनों से अधिक समय से रहने वाला कोई भी निवासी (विदेशी नागरिक या शरणार्थी) आधार कार्ड के लिए आवेदन कर सकता है। इसलिए यह केवल विशिष्ट पहचान और पते का प्रमाण है, नागरिकता का नहीं।
Q2: वोटर आईडी को आधार से जोड़ने को लेकर क्या मुख्य चिंता व्यक्त की गई है?
A2: मुख्य चिंता यह है कि बायोमेट्रिक या डेटा मिसमैच के कारण वास्तविक भारतीय नागरिकों के नाम मतदाता सूची से हट सकते हैं, और दूसरी ओर, आधार कार्ड रखने वाले गैर-नागरिकों को अनजाने में मतदान का अधिकार मिल सकता है।
Q3: मतदाता सूची के सत्यापन के लिए पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने किस प्रणाली को बेहतर बताया है?
A3: उन्होंने भारत निर्वाचन आयोग की मौजूदा स्वतंत्र प्रणाली को बेहतर बताया है, जिसमें बूथ स्तर के अधिकारियों (BLOs) द्वारा घर-घर जाकर भौतिक सत्यापन किया जाता है और सूचियों को सार्वजनिक कर आपत्तियां आमंत्रित की जाती हैं।











