Sonam Wangchuk hunger strike : जब हमारे देश का युवा किसी प्रतियोगी परीक्षा (Competitive Exam) की तैयारी करता है, तो वह अपना दिन-रात एक कर देता है। लेकिन जब उसे पता चलता है कि जिस परीक्षा के लिए उसने सालों मेहनत की, उसका पेपर लीक हो गया है, तो उसका दिल टूट जाता है। आजकल देश में नीट (NEET-UG) जैसी बड़ी परीक्षाओं में हुई धांधली और भ्रष्टाचार का मुद्दा हर जगह छाया हुआ है।
इसी मुद्दे पर छात्रों को न्याय दिलाने के लिए, देश के जाने-माने शिक्षाविद् (Educationist) और रमन मैग्सेसे अवॉर्ड से सम्मानित सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक बार फिर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं। आज उनके अनशन को 16 दिन हो चुके हैं। उनकी तबीयत लगातार बिगड़ रही है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि केंद्र सरकार ने इस पर पूरी तरह से चुप्पी साध रखी है।
आइए, एक दोस्त की तरह बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं कि यह पूरा आंदोलन क्या है, छात्रों की मांगें क्या हैं और 59 साल के सोनम वांगचुक की सेहत इस वक्त कैसी है।
आखिर जंतर-मंतर पर क्यों हो रहा है यह आंदोलन?
यह पूरा विवाद देश के एग्जामिनेशन सिस्टम और उसमें फैले भ्रष्टाचार से जुड़ा है।
इस विरोध प्रदर्शन की शुरुआत 20 जून 2026 को हुई थी, जब ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) और ‘ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन’ (AISA) जैसे छात्र संगठनों ने पेपर लीक के खिलाफ जंतर-मंतर पर डेरा डाला था।
छात्रों के इस संघर्ष को देखकर सोनम वांगचुक खुद को रोक नहीं पाए। वे हमेशा से शिक्षा और युवाओं के लिए लड़ते रहे हैं। छात्रों की आवाज को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए वांगचुक 28 जून 2026 को इस अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल (Hunger Strike) में शामिल हो गए।
सोनम वांगचुक और छात्रों की 3 बड़ी मांगें क्या हैं?
जंतर-मंतर पर बैठे इन प्रदर्शनकारियों की मांगें बिल्कुल साफ और सीधी हैं:
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शिक्षा मंत्री का इस्तीफा: नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की परीक्षाओं में जो भी धांधली हुई है, उसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को तुरंत अपने पद से इस्तीफा देना चाहिए।
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पीड़ित परिवारों को 1 करोड़ का मुआवजा: पेपर लीक और सिस्टम की नाकामी से निराश होकर जिन लगभग 20 छात्रों ने आत्महत्या कर ली, उनके परिवारों को 1-1 करोड़ रुपये की आर्थिक मदद दी जाए।
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सिस्टम में पारदर्शी सुधार: देश की परीक्षा प्रणाली में तुरंत सुधार किया जाए। सरकार नई नीतियां बनाते समय छात्रों और वांगचुक जैसे शिक्षाविदों को शामिल करे।
सोनम वांगचुक ने सिस्टम पर बहुत गहरी चोट करते हुए कहा है, “अगर पेपर लीक से पास हुए डॉक्टर आपके बच्चों का इलाज करेंगे और बेईमानी से पास हुए इंजीनियर आपकी इमारतें बनाएंगे, तो कई जानें जाएंगी। यह सिर्फ शिक्षा प्रणाली का नहीं, बल्कि पूरे समाज का दोष है।”
16 दिन बाद कैसी है वांगचुक और छात्रों की सेहत? (डराने वाले आंकड़े)
लगातार 16 दिनों से अन्न त्यागने का असर अब 59 साल के वांगचुक के शरीर पर साफ दिखने लगा है। CJP द्वारा जारी किए गए ताज़ा मेडिकल बुलेटिन के आंकड़े किसी को भी डरा सकते हैं:
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वजन (Weight): वांगचुक का वजन 8.2 किलोग्राम तक कम हो गया है।
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ब्लड शुगर (Sugar Level): उनका ब्लड ग्लूकोज लेवल खतरनाक रूप से गिरकर 67 mg/dL तक पहुंच गया है (जो एक आम इंसान में 100 के आसपास होना चाहिए)।
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ब्लड प्रेशर (BP): बीपी 107/70 mm Hg रिकॉर्ड किया गया है।
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शारीरिक हालत: उन्हें लगातार चक्कर आ रहे हैं और शरीर इतना कमजोर हो गया है कि उनकी पसलियां साफ दिखाई देने लगी हैं।
सिर्फ वांगचुक ही नहीं, उनके साथ अनशन पर बैठे AISA के एक छात्र (दीपक) की हालत इतनी बिगड़ गई कि उसका बीपी 80/40 तक आ गया। शरीर का 15% वजन कम होने और ‘हाइपोवोलेमिक शॉक’ (Hypovolemic shock) के कारण उसे तुरंत अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा है।
सरकार की खामोशी और गिरफ्तारी का डर
एक तरफ जहां जंतर-मंतर पर लोग अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं, वहीं केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर पूरी तरह से चुप्पी साध रखी है। सरकार की तरफ से अभी तक बातचीत की कोई पहल नहीं की गई है।
CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने सरकार से अपील करते हुए कहा है, “इसे अपने अहंकार की लड़ाई न बनाएं, यहां इंसानी जानें दांव पर लगी हैं।”
वहीं, आंदोलन कर रहे छात्रों को अब एक नया डर भी सता रहा है। उन्हें लगता है कि सरकार उन्हें ‘एंटी-नेशनल’ (देशद्रोही) बताकर उन पर UAPA या NSA जैसे कड़े कानून लगा सकती है और उन्हें जेल में डाल सकती है। हालांकि, छात्रों का कहना है कि वे अपने भविष्य के लिए यह कीमत चुकाने को भी तैयार हैं।
विपक्ष का समर्थन: कौन-कौन पहुंचा जंतर-मंतर?
सरकार भले ही चुप हो, लेकिन विपक्षी पार्टियां अब खुलकर छात्रों के समर्थन में आ गई हैं।
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आम आदमी पार्टी (AAP): दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी ने जंतर-मंतर जाकर छात्रों से मुलाकात की और शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए।
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समाजवादी पार्टी और वामदल: सपा के युवा सांसद पुष्पेंद्र सरोज और CPI(M) के सांसद अमरा राम ने भी प्रदर्शनकारियों का साथ दिया है।
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अन्य नेता: शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे, डीएमके सांसद कनिमोझी और केरल की पूर्व स्वास्थ्य मंत्री के.के. शैलजा ने भी सरकार से तुरंत दखल देने और वांगचुक से अनशन तोड़ने की भावुक अपील की है।
आगे क्या होगा? (20 जुलाई का ‘संसद मार्च’)
प्रदर्शनकारियों ने साफ कर दिया है कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी जाती हैं, तो वे चुप नहीं बैठेंगे। उन्होंने ऐलान किया है कि संसद के मानसून सत्र के पहले दिन यानी 20 जुलाई 2026 को वे जंतर-मंतर से लेकर संसद भवन तक एक विशाल और शांतिपूर्ण मार्च (Parliament March) निकालेंगे। उन्होंने देशभर के छात्रों और माता-पिता से इस मार्च में शामिल होने की अपील की है।
एक ऐसा व्यक्ति जिसे उसके इनोवेशन के लिए अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड मिला हो, वह आज सड़क पर युवाओं के भविष्य के लिए भूखा बैठा है। ऐसे में सरकार का उनसे बात न करना हमारे लोकतंत्र में ‘संवादहीनता’ (Communication Gap) का एक बहुत ही निराशाजनक उदाहरण है। अब पूरे देश की निगाहें 20 जुलाई को होने वाले संसद मार्च और मानसून सत्र पर टिकी हैं। देखना होगा कि क्या सरकार इस मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ती है या नहीं।











