TMC Rebellion: राजनीति में कब कौन अर्श से फर्श पर आ जाए और कौन रातों-रात हीरो बन जाए, इसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल है। इन दिनों देश की सियासत में एक ऐसा ही हैरान करने वाला मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। सोचिए, एक ऐसी राजनीतिक पार्टी जिसका नाम शायद ही किसी ने सुना हो, जिसे चुनाव में सिर्फ 822 वोट मिले हों, वह अचानक से राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ जाए…
जी हां, पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों ने रविवार को दिल्ली में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात की और एक गुमनाम सी पार्टी ‘नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) में विलय (Merger) का ऐलान कर दिया। इस खबर के बाद हर कोई गूगल पर यही सर्च कर रहा है कि आखिर ये एनसीपीआई क्या बला है? आइए, एक दोस्त की तरह बिल्कुल आसान भाषा में आपको इस रहस्यमयी पार्टी की पूरी कुंडली बताते हैं।
आखिर क्या है एनसीपीआई (NCPI) और इसका इतिहास?
चुनाव आयोग (Election Commission) के दस्तावेजों पर नजर डालें, तो एनसीपीआई कोई बहुत पुरानी या बड़ी पार्टी नहीं है। इसे 20 जनवरी 2023 को एक ‘गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल’ (RUPP) के रूप में रजिस्ट्रेशन मिला था।
यह पार्टी एक ही परिवार द्वारा चलाई जा रही थी। इसके अध्यक्ष का नाम उत्तिया कुंडू है और पार्टी की कोषाध्यक्ष (Treasurer) उनकी पत्नी शेउली कुंडू हैं। दस्तावेजों से यह भी पता चलता है कि शेउली कुंडू दो अन्य संस्थाओं (बिस्वाबाजार प्राइवेट लिमिटेड और पश्चिम बंग असंगठित महिला कर्मी एसोसिएशन) की डायरेक्टर भी हैं। दिलचस्प बात यह है कि इन कंपनियों और इस राजनीतिक पार्टी का रजिस्टर्ड पता एक ही है— पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले का बनिपुर इलाका।
सिर्फ 1 लाख का चंदा और 822 वोट: चुनाव में क्या रहा हाल?
पश्चिम बंगाल में रजिस्टर्ड होने के बावजूद, इस पार्टी ने अपना पहला चुनाव साल 2023 में त्रिपुरा में लड़ा था। पार्टी के नेता शांतनु डे के मुताबिक, उन्होंने त्रिपुरा के आदिवासी इलाकों (TTAADC) के लोगों की आवाज उठाने के लिए यह फैसला लिया था।
पार्टी का चुनावी प्रदर्शन किसी मजाक से कम नहीं था:
पार्टी ने कुल 7 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, जिनमें से 4 के तो नामांकन (Nomination) ही खारिज हो गए।
बाकी बची 2 सीटों पर पार्टी अपने चुनाव चिह्न के साथ लड़ी। चावमानू सीट पर पार्टी को 536 वोट और कैलाशहर सीट पर सिर्फ 286 वोट मिले।
यानी कुल मिलाकर पूरी पार्टी को सिर्फ 822 वोट ही मिल सके। एक अन्य सीट पर उन्होंने निर्दलीय को समर्थन दिया था, जिसे 376 वोट मिले थे।
फंडिंग की बात करें, तो चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के मुताबिक इस पार्टी को अब तक सिर्फ 1.13 लाख रुपये का चंदा मिला था।
पैसों की तंगी और गुमनामी के अंधेरे में खो गई थी पार्टी
त्रिपुरा में करारी हार के बाद पार्टी की स्थिति और खराब हो गई। शांतनु डे बताते हैं कि एनसीपीआई ने 2023 में पश्चिम बंगाल का पंचायत चुनाव लड़ने का भी मन बनाया था, लेकिन उनके पास चुनाव लड़ने के लिए पैसे ही नहीं थे।
पैसों की कमी की वजह से पार्टी के अंदर आपसी झगड़े शुरू हो गए और पार्टी का सारा काम ठप पड़ गया। इसके बाद इन्होंने 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भी किस्मत आजमाने की सोची, लेकिन संसाधनों के अभाव में यह पार्टी गुमनामी के अंधेरे में खो गई।
टीएमसी के 20 बागियों की एंट्री से कैसे पलटा पूरा गेम?
कल तक जिस पार्टी के पास ढंग का दफ्तर चलाने के पैसे नहीं थे और जिसे 1000 वोट भी नहीं मिले थे, वह आज देश की बड़ी राजनीतिक पार्टियों की कतार में खड़ी हो गई है।
तृणमूल कांग्रेस (TMC) में मची अंदरूनी बगावत का सीधा फायदा एनसीपीआई को मिला है। टीएमसी के लगभग दो-तिहाई (20) बागी सांसदों ने इस पार्टी में विलय कर लिया है। रविवार शाम इन सभी बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की।
इस बैठक के बाद बागी सांसद काकोली घोष दस्तिदार ने मीडिया को बताया कि उन्होंने स्पीकर को एक पत्र सौंप दिया है। इस पत्र में उन्होंने मांग की है कि उन्हें लोकसभा में एक ‘अलग संसदीय समूह’ (Separate Parliamentary Group) के रूप में मान्यता दी जाए और उनके बैठने की व्यवस्था भी अलग की जाए।
राजनीति का यह पूरा घटनाक्रम किसी फिल्म की स्क्रिप्ट जैसा लगता है। बंगाल की राजनीति में टीएमसी के टूटने से जो सियासी भूचाल आया है, उसने एनसीपीआई की किस्मत रातों-रात बदल दी है। अब 20 सांसदों वाली यह पार्टी संसद में क्या रुख अपनाती है और बंगाल की राजनीति में आगे क्या ‘खेला’ होता है, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा।













