Biofuel vs Water Crisis: आज जब भी हम पेट्रोल पंप पर जाते हैं, तो हमें ‘एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल’ (Ethanol Blended Petrol) लिखा हुआ नजर आता है। भारत सरकार पेट्रोल-डीजल के आयात (Import) पर अपनी निर्भरता कम करने और पर्यावरण को साफ रखने के लिए तेजी से एथेनॉल के उत्पादन और इस्तेमाल को बढ़ावा दे रही है। यह सच है कि बायोफ्यूल (Biofuel) होने के नाते एथेनॉल पेट्रोल के मुकाबले कम प्रदूषण फैलाता है।
लेकिन, क्या आपने कभी सोचा है कि जो एथेनॉल हमारी गाड़ियों का ईंधन बन रहा है, उसे बनाने में कितना पानी (Water) खर्च होता है? यह सवाल आज के समय में पर्यावरण के लिए एक बहुत बड़ी चिंता का विषय बन गया है। आपको जानकर हैरानी होगी कि फैक्ट्रियों (Distilleries) में तो सिर्फ कुछ लीटर पानी ही लगता है, लेकिन असल खेल फसलों की खेती में है।
आइए, बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं कि 1 लीटर एथेनॉल बनाने के पीछे पानी की खपत का पूरा गणित क्या है और यह क्यों हमारे भूजल (Groundwater) के लिए खतरे की घंटी बन सकता है।
आखिर 1 लीटर एथेनॉल बनाने में कितना पानी खर्च होता है?
अगर हम मोटे तौर पर बात करें, तो 1 लीटर एथेनॉल तैयार करने में 2800 लीटर से लेकर 10,790 लीटर तक पानी खर्च हो सकता है।
आप सोच रहे होंगे कि इतना बड़ा अंतर क्यों? दरअसल, पानी की यह खपत पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करती है कि एथेनॉल किस फसल (कच्चे माल) से बनाया जा रहा है। चावल, मक्का और गन्ना— ये तीन फसलें भारत में एथेनॉल बनाने का सबसे बड़ा जरिया हैं, और इन तीनों के लिए पानी की जरूरत अलग-अलग होती है।
चावल, मक्का और गन्ना: किस फसल से एथेनॉल बनाने में कितना पानी लगता है?
1. चावल (Rice): सबसे ज्यादा पानी पीने वाली फसल
चावल (धान) से एथेनॉल बनाना पानी के नजरिए से सबसे महंगा सौदा है। 1 लीटर एथेनॉल बनाने के लिए लगभग 2.5 से 3 किलो चावल की जरूरत होती है। और इस 3 किलो चावल को खेतों में उगाने के लिए लगभग 10,790 लीटर पानी खर्च हो जाता है। यही वजह है कि चावल का ‘वॉटर फुटप्रिंट’ (Water Footprint) एथेनॉल उत्पादन में सबसे ज्यादा माना जाता है।
2. मक्का (Maize): पानी कम, पर चिंता कम नहीं
भारत के एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम में मक्का एक बहुत जरूरी कच्चे माल के रूप में उभर रहा है। अगर हम मक्के की खेती के पूरे चक्र को देखें, तो इससे 1 लीटर एथेनॉल बनाने में लगभग 4670 लीटर पानी खर्च होता है। हालांकि यह चावल के 10 हजार लीटर के मुकाबले काफी कम है, लेकिन फिर भी पानी की यह मात्रा बहुत ज्यादा है।
3. गन्ना (Sugarcane): पारंपरिक और बेहतर विकल्प
भारत में एथेनॉल बनाने के लिए गन्ने का इस्तेमाल सबसे पुराना और आम तरीका है। फसल की किस्म और जिस इलाके में इसे उगाया जा रहा है, उसके आधार पर गन्ने से 1 लीटर एथेनॉल बनाने में 2860 लीटर से 3630 लीटर पानी की जरूरत होती है। तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो चावल और मक्के के मुकाबले गन्ना एथेनॉल उत्पादन के लिए पानी बचाने वाला एक बेहतर विकल्प है।
‘वर्चुअल वॉटर’ का कॉन्सेप्ट: फैक्ट्रियों में नहीं, खेतों में खर्च होता है असली पानी
यहां एक बहुत बड़ी गलतफहमी दूर करना जरूरी है। कई लोगों को लगता है कि एथेनॉल बनाने वाली फैक्ट्रियां (Distillery Plants) ही सारा पानी पी जाती हैं। लेकिन सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है।
एक फैक्ट्री के अंदर 1 लीटर एथेनॉल को प्रोसेस करने में सीधे तौर पर सिर्फ 3 से 5 लीटर पानी का ही इस्तेमाल होता है।
तो फिर ये हजारों लीटर का आंकड़ा कहां से आया? इसे समझने के लिए हमें ‘वर्चुअल वॉटर’ (Virtual Water) को समझना होगा। वर्चुअल वॉटर का मतलब है वह पानी जो किसी फसल को बीज से लेकर पूरी तरह तैयार होने तक खेत में चाहिए होता है। इसमें सिंचाई का पानी, बारिश का पानी और मिट्टी की नमी सब शामिल है। यानी पानी की असली खपत तो फैक्ट्री में कच्चा माल पहुंचने से पहले ही खेतों में हो चुकी होती है।
भूजल संकट: क्या एथेनॉल उत्पादन से बढ़ सकती है पानी की कमी?
एथेनॉल बेशक पेट्रोल का एक अच्छा और सस्ता विकल्प है, लेकिन पानी की इस भारी खपत ने नीति आयोग (NITI Aayog) और पर्यावरण विशेषज्ञों (Environmentalists) की रातों की नींद उड़ा दी है।
भारत के कई राज्यों (जैसे पंजाब, हरियाणा, यूपी और महाराष्ट्र) में पहले से ही भूजल का स्तर (Groundwater Level) खतरनाक रूप से नीचे जा रहा है। अगर हम सिर्फ एथेनॉल बनाने के लालच में चावल और गन्ने जैसी ज्यादा पानी पीने वाली फसलों की खेती इसी बड़े पैमाने पर करते रहे, तो आने वाले सालों में पीने के पानी और आम खेती के लिए गंभीर संकट पैदा हो सकता है।
एथेनॉल से गाड़ियां चलाना भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक शानदार कदम है, लेकिन इसे पर्यावरण की कीमत पर नहीं किया जा सकता। सरकार और किसानों को मिलकर ऐसी नई तकनीकों और फसलों (जैसे बांस या कृषि वेस्ट) पर ध्यान देना होगा, जिनसे एथेनॉल तो बन जाए लेकिन देश के जमीन का पानी न सूखे। ऊर्जा भी जरूरी है, लेकिन जल ही जीवन है— इस बात को हम कभी नहीं भूल सकते।













