Meta AI Data Center: आज हम अपने फोन पर बड़ी आसानी से एआई (AI) का इस्तेमाल करते हैं। चैटबॉट से सवाल पूछना हो या कोई फोटो बनानी हो, यह सब सेकंडों में हो जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपके फोन के पीछे जो एआई काम कर रहा है, उसे चलाने के लिए कितनी भारी-भरकम मशीनों और बिजली की जरूरत पड़ती है?
फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप की पैरेंट कंपनी ‘मेटा’ (Meta) आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दुनिया में अपना दबदबा बनाने के लिए पानी की तरह पैसा बहा रही है। कंपनी ने हाल ही में कनाडा में एक ऐसा विशाल डेटा सेंटर बनाने का ऐलान किया है, जिसका बजट और बिजली का खर्च सुनकर किसी के भी होश उड़ जाएंगे। आइए, एक दोस्त की तरह बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं कि मेटा का यह नया प्रोजेक्ट क्या है, यह कितनी बिजली खर्च करेगा और कंपनी ने इसे बनाने के लिए कनाडा को ही क्यों चुना।
क्या है मेटा का नया मेगा प्रोजेक्ट? (9.17 अरब डॉलर का निवेश)
मेटा एआई की बढ़ती डिमांड को देखते हुए अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को तेजी से बढ़ा रहा है। इसी कड़ी में कंपनी ने कनाडा के अल्बर्टा प्रांत (स्टर्जन काउंटी) में अपना नया डेटा सेंटर बनाने की घोषणा की है।
आंकड़ों की बात करें तो इस विशाल प्रोजेक्ट पर कंपनी लगभग C$13 बिलियन (करीब 9.17 अरब अमेरिकी डॉलर) का भारी-भरकम निवेश करने जा रही है। आपको बता दें कि यह कनाडा में मेटा का पहला और पूरी दुनिया में उनका 33वां डेटा सेंटर होगा। इस डेटा सेंटर का मुख्य काम दुनिया भर में इस्तेमाल हो रहे एडवांस एआई मॉडल्स को ट्रेन करना और उन्हें बिना रुके चलाना होगा।
8 लाख घरों के बराबर बिजली पिएगा यह डेटा सेंटर!
इस पूरे प्रोजेक्ट में जिस बात की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, वह है इसकी बिजली की खपत। एआई को चलाने वाले सर्वर बहुत ज्यादा बिजली खींचते हैं।
शुरुआत में इस डेटा सेंटर की क्षमता 1 गीगावाट (1 GW) रखी जाएगी। जैसे-जैसे एआई की मांग बढ़ेगी, भविष्य में इसे बढ़ाकर 1.8 गीगावाट तक कर दिया जाएगा।
अगर हम इसे आम आदमी की भाषा में समझें, तो मेटा का यह अकेला डेटा सेंटर उतनी बिजली इस्तेमाल करेगा, जितनी बिजली से लगभग 8 लाख घर रोशन होते हैं। जरा सोचिए, सिर्फ एक कंपनी की एआई मशीनें एक छोटे शहर के बराबर बिजली की खपत करेंगी!
मेटा ने अपना सेंटर बनाने के लिए कनाडा (अल्बर्टा) को ही क्यों चुना?
अब आपके मन में यह सवाल आ रहा होगा कि मेटा जैसी अमेरिकी कंपनी अपना इतना बड़ा डेटा सेंटर बनाने के लिए कनाडा के अल्बर्टा क्यों गई? इसके पीछे 3 बड़े और लॉजिकल कारण हैं:
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ठंडा मौसम: एआई के बड़े-बड़े सर्वर (कंप्यूटर) जब 24 घंटे चलते हैं, तो वे आग की तरह गर्म हो जाते हैं। उन्हें ठंडा रखने के लिए बहुत बड़े एसी और कूलिंग सिस्टम की जरूरत होती है। अल्बर्टा का मौसम ज्यादातर ठंडा रहता है, जिससे सर्वर को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखने में मदद मिलेगी और कंपनी के कूलिंग का करोड़ों रुपये का खर्च बच जाएगा।
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सस्ती ऊर्जा (Natural Gas): अल्बर्टा में प्राकृतिक गैस (Natural gas) की भरपूर सप्लाई है। दुनिया के कई अन्य इलाकों के मुकाबले यहां ऊर्जा और बिजली की लागत काफी कम है।
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सरकार का सपोर्ट: अल्बर्टा की सरकार भी बड़ी टेक कंपनियों को बुलाने के लिए पूरी कोशिश कर रही है। वहां के टेक्नोलॉजी मंत्री नेट ग्लूबिश ने इस प्रोजेक्ट का स्वागत करते हुए कहा कि, “यह अपने आकार और स्केल का पहला प्रोजेक्ट जरूर है, लेकिन यह आखिरी नहीं होगा।”
अपनी बिजली खुद बनाएगी कंपनी, आम लोगों को नहीं होगी दिक्कत
जब 8 लाख घरों के बराबर बिजली एक ही डेटा सेंटर को जाएगी, तो वहां के आम लोगों के मन में यह डर बैठना लाजमी है कि कहीं उनके घरों की बिजली तो नहीं कटने लगेगी?
मेटा ने इस बात का पूरा ध्यान रखा है। कंपनी ने साफ कर दिया है कि वह वहां के मौजूदा पावर ग्रिड पर बोझ नहीं डालेगी। इस प्रोजेक्ट को चलाने के लिए मेटा खुद नई बिजली पैदा करने का इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करेगी और लोकल इलेक्ट्रिसिटी ग्रिड को अपग्रेड (बेहतर बनाने) का पूरा खर्च भी अपनी जेब से ही उठाएगी।
भविष्य की रेस: AI को आखिर इतनी बिजली और पानी क्यों चाहिए?
आजकल गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न और मेटा जैसी तमाम बड़ी कंपनियों के बीच ‘नेक्स्ट जेनरेशन एआई’ बनाने की होड़ मची है।
एआई इंसानों की तरह सोचता है और इसके लिए उसे करोड़ों-अरबों डेटा को एक साथ प्रोसेस करना पड़ता है। इस प्रोसेसिंग में बेतहाशा बिजली खर्च होती है और मशीनों को ठंडा रखने के लिए लाखों लीटर पानी का इस्तेमाल होता है। यही वजह है कि ये कंपनियां अब ठंडे देशों और सस्ती बिजली वाली जगहों की तरफ भाग रही हैं।
कुल मिलाकर, मेटा का यह 9.17 अरब डॉलर का निवेश यह साबित करता है कि एआई का भविष्य बहुत विशाल होने वाला है। आने वाले समय में सिर्फ वही देश या कंपनी दुनिया पर राज करेगी, जिसके पास सबसे तगड़ा डेटा सेंटर और उसे चलाने के लिए पर्याप्त बिजली होगी। हालांकि, एआई की वजह से पर्यावरण, बिजली और पानी पर जो दबाव पड़ रहा है, वह आने वाले सालों में दुनिया के लिए एक नई चुनौती भी बन सकता है।












