Political Opinion: दिल्ली का जंतर-मंतर इन दिनों एक बार फिर से एक बड़े जन-आंदोलन का गवाह बन रहा है। देश के एग्जामिनेशन सिस्टम में धांधली और युवाओं के भविष्य के लिए आवाज उठाते हुए मशहूर शिक्षाविद् और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) पिछले 18 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे हैं। बिना कुछ खाए-पिए उनका वजन करीब साढ़े आठ किलो कम हो चुका है और उनकी गिरती सेहत पूरे देश के लिए चिंता का विषय बन गई है।
लेकिन इस पूरे आंदोलन में एक बात जो सबसे ज्यादा खटक रही है, वह है कांग्रेस पार्टी और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की दूरी। जहां एक तरफ उद्धव ठाकरे, आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस जैसे कई विपक्षी दल इस आंदोलन को अपना खुला समर्थन दे रहे हैं, वहीं कांग्रेस अभी भी दूर से तमाशा देख रही है।
आइए, एक दोस्त की तरह बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं कि यह पूरा आंदोलन क्या है, इसकी तुलना 2011 के अन्ना हजारे आंदोलन से क्यों हो रही है, और आखिर राहुल गांधी जंतर-मंतर जाने से क्यों कतरा रहे हैं।
‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का आंदोलन और वांगचुक की बिगड़ती सेहत
इस आंदोलन की शुरुआत ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) नाम के एक ऑनलाइन छात्र संगठन ने की थी। इनका मुख्य मुद्दा प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे NEET) में होने वाली अनियमितताओं और पेपर लीक के खिलाफ आवाज उठाना है।
जब युवाओं का यह आंदोलन शुरू हुआ, तो शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति लाने वाले 59 वर्षीय सोनम वांगचुक भी 28 जून को इसमें शामिल हो गए और उन्होंने अनिश्चितकालीन अनशन की घोषणा कर दी। वांगचुक ने साफ कहा है कि जब तक सरकार छात्रों के हक में कोई ठोस फैसला नहीं लेती, वे पीछे नहीं हटेंगे।
2011 के अन्ना आंदोलन से क्यों हो रही है तुलना? (कांग्रेस vs बीजेपी का रुख)
राजनीतिक पंडित इस आंदोलन को 2011 में हुए अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ आंदोलन से जोड़कर देख रहे हैं।
याद कीजिए, 2011 में जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी, तो तत्कालीन विपक्षी पार्टी बीजेपी ने अन्ना आंदोलन का खुलकर समर्थन किया था। उस आंदोलन ने 2014 में कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने और बीजेपी को पूर्ण बहुमत दिलाने में एक बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। उस समय विपक्ष के बड़े नेता और बॉलीवुड के सितारे अन्ना के मंच पर रोज आते थे, लेकिन आज जब केंद्र में बीजेपी की सरकार है, तो मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस उस तरह की सक्रियता नहीं दिखा रही है।
राहुल गांधी दूर क्यों हैं? (कांग्रेस के डर की इनसाइड स्टोरी)
राहुल गांधी ने हाल ही में NEET परीक्षा की धांधली पर खूब बयान दिए हैं और वे राजस्थान के कोटा जाकर छात्रों से भी मिले थे। लेकिन जंतर-मंतर पर उनकी गैर-मौजूदगी कई सवाल खड़े कर रही है।
कांग्रेस का डर क्या है?
दरअसल, कांग्रेस को डर है कि कहीं 2011 का इतिहास खुद उसी पर भारी न पड़ जाए। अन्ना आंदोलन का फायदा बीजेपी और आम आदमी पार्टी (AAP) को मिला था और कांग्रेस साफ हो गई थी। कांग्रेस को लगता है कि अगर वह सीजेपी (CJP) जैसे नए संगठनों के मंच पर जाती है, तो कहीं बीजेपी विरोधी माहौल का फायदा कांग्रेस को मिलने के बजाय इन नए संगठनों के खाते में न चला जाए। इसीलिए कांग्रेस इस मुद्दे पर अपनी अलग ‘छात्रों की गूंज’ नाम की मुहिम चला रही है। वांगचुक ने भी चेताया है कि अगर विपक्ष इस युवा आंदोलन का साथ नहीं देगा, तो यह उनकी ‘संकीर्ण सोच’ (छोटी सोच) मानी जाएगी और जनता उन्हें नकार देगी।
जिग्नेश मेवाणी और निखिल वागले के बीच छिड़ी तीखी बहस
कांग्रेस के इस रवैये पर वरिष्ठ पत्रकार निखिल वागले ने ‘एक्स’ (X) पर सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि जब शिवसेना (यूबीटी), टीएमसी और वामपंथी दल समझदारी दिखाकर वांगचुक का समर्थन कर रहे हैं, तो राहुल गांधी ऐसा क्यों नहीं कर रहे?
इसका जवाब देते हुए कांग्रेस के युवा विधायक जिग्नेश मेवाणी ने कहा कि कांग्रेस वांगचुक की सेहत को लेकर चिंतित है और युवाओं के साथ खड़ी है। जिग्नेश ने बचाव करते हुए कहा कि हम इस मुद्दे की अनदेखी नहीं कर रहे हैं, बल्कि अपनी तरफ से समानांतर (पैरेलल) लड़ाई लड़ रहे हैं।
इस पर वागले ने पलटवार करते हुए लिखा कि राहुल गांधी सिर्फ एक पार्टी के नेता नहीं, बल्कि ‘नेता प्रतिपक्ष’ हैं। उन्हें हर नागरिक आंदोलन के साथ खड़ा होना चाहिए, जिससे उनकी जनस्वीकार्यता और साख बढ़ेगी।
शशि थरूर का भावुक खत: ‘मैं एक राजनेता नहीं, आम नागरिक बनकर लिख रहा हूं’
इस बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने जंतर-मंतर पर बैठे युवाओं के नाम एक बहुत ही भावुक खुला पत्र (Open Letter) लिखा।
थरूर ने अपने खुद के संघर्ष का जिक्र करते हुए लिखा कि वे एक मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं और उन्होंने जो कुछ हासिल किया, वह कड़ी मेहनत और निष्पक्ष परीक्षाओं के दम पर किया। उन्होंने छात्रों का दर्द बांटते हुए कहा, “जब परीक्षा का सिस्टम टूटता है, पेपर लीक होते हैं, तो अमीर बच्चों को कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों के सपने टूट जाते हैं।” थरूर ने युवाओं को भरोसा दिलाया कि पूरा देश उनका दर्द समझ रहा है और वे अकेले नहीं हैं।
विपक्ष का समर्थन और उद्धव ठाकरे की अपील
कांग्रेस के आधिकारिक समर्थन न देने के बावजूद, आम आदमी पार्टी के संजय सिंह, दिल्ली की पूर्व सीएम आतिशी, टीएमसी की महुआ मोइत्रा, और वामपंथी नेता वृंदा करात जैसे कई बड़े चेहरे जंतर-मंतर पर आ चुके हैं।
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने तो 20 जुलाई को खुद जंतर-मंतर जाने का ऐलान किया है। उन्होंने राहुल गांधी से भी अपील की है कि वे भी युवाओं का साथ देने वहां आएं।
कौन हैं सोनम वांगचुक? (थ्री इडियट्स के ‘फुंसुख वांगड़ू’)
अगर आप नहीं जानते, तो बता दें कि बॉलीवुड की सुपरहिट फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ (3 Idiots) में आमिर खान का किरदार ‘फुंसुख वांगड़ू’ सोनम वांगचुक से ही प्रेरित था।
सोनम हमेशा से रटने वाली पढ़ाई के खिलाफ रहे हैं और व्यावहारिक (Practical) शिक्षा पर जोर देते हैं। उन्होंने लद्दाख में कई बड़े इनोवेशन किए हैं। इससे पहले वे लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए भी अनशन कर चुके हैं, जिसके कारण उन्हें हिरासत में भी लिया गया था। अपने सिद्धांतों के लिए वे हमेशा सरकार से टकराते रहे हैं।











