Stray Cattle Menace: भारतीय राजनीति में गाय केवल एक पशु नहीं, बल्कि आस्था और चुनावी विमर्श का सबसे बड़ा केंद्र बन चुकी है। सत्तारूढ़ दल द्वारा लगातार गाय को ‘गौमाता’ का दर्जा देकर इसके संरक्षण के नाम पर व्यापक राजनीतिक समर्थन जुटाया जाता रहा है। लेकिन जब बात ज़मीनी हकीकत और असल संरक्षण की आती है, तो सरकारी दावों और ज़मीनी हकीकत के बीच एक बहुत गहरी खाई नज़र आती है। राष्ट्रीय राजमार्गों से लेकर गांव की पगडंडियों तक, बेसहारा गोवंश (छुट्टा पशु) आज हादसों का शिकार होकर सड़कों पर दम तोड़ने को मजबूर हैं।
संरक्षण के वादे और ज़मीनी हकीकत
कठोर गोवंश वध निवारण कानूनों के लागू होने के बाद बेसहारा पशुओं की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है। नीतियां बनाते समय इस बात का ध्यान नहीं रखा गया कि जो गाय दूध देना बंद कर देगी, या जो नर गोवंश कृषि कार्यों के लिए अनुपयोगी हो जाएगा, उसका क्या होगा। नतीजतन, लोगों ने उन्हें सड़कों पर खुला छोड़ना शुरू कर दिया।
प्रमुख चिंताजनक पहलू:
सड़क दुर्घटनाओं का केंद्र: हाईवे और एक्सप्रेसवे पर अचानक मवेशियों के आ जाने से हर साल हज़ारों गंभीर सड़क हादसे हो रहे हैं। इन हादसों में न केवल बेगुनाह नागरिकों की जान जा रही है, बल्कि गोवंश भी तड़प-तड़प कर मरने को विवश हैं।
पॉलीथिन और कचरा खाने की मजबूरी: शहरों में आवारा घूमती गाएं कूड़े के ढेरों में अपना भोजन तलाशने को मजबूर हैं। प्लास्टिक और जहरीला कचरा खाने से इनकी आंतें चोक हो जाती हैं, जिससे इनकी बेहद दर्दनाक मौत होती है।
गौशालाओं की बदहाली: सरकारों ने करोड़ों के बजट से गौशालाओं के निर्माण और रखरखाव का दावा तो किया, लेकिन कई मीडिया और प्रशासनिक रिपोर्ट्स में यह सामने आया है कि इनमें क्षमता से अधिक पशुओं को ठूंस कर रखा जाता है। चारे-पानी के अभाव और कीचड़-गंदगी के बीच गौशालाएं जानवरों के लिए सुरक्षित आश्रय के बजाय यातना गृह बन गई हैं।
किसानों का दर्द: खेतों में रतजगा
यह समस्या केवल सड़कों तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले किसानों के लिए यह सबसे बड़ा संकट बन चुकी है।
फसलों की बर्बादी: छुट्टा पशुओं के झुंड रातों-रात किसानों की महीनों की मेहनत (फसल) चट कर जाते हैं।
आर्थिक और शारीरिक बोझ: कड़ाके की ठंड हो या बरसात, किसानों को अपनी फसल बचाने के लिए रात-रात भर खेतों में लाठी लेकर पहरा देना पड़ता है।
कानूनी खौफ: किसान अपने ही खेतों से इन पशुओं को खदेड़ने में डरते हैं, क्योंकि किसी भी प्रकार की चोट लगने पर तथाकथित गौरक्षकों या पुलिस द्वारा पशु क्रूरता के नाम पर कार्रवाई का डर बना रहता है।
रिसर्च और संदर्भ (Contextual Background)
पशुधन गणना (Livestock Census): 2019 की 20वीं पशुधन गणना के आंकड़े बताते हैं कि देश में बेसहारा या आवारा मवेशियों की संख्या 50 लाख से अधिक थी, जिसका एक बहुत बड़ा हिस्सा उत्तर भारत के राज्यों में है। वर्तमान में यह संख्या और भी अधिक विकराल हो चुकी है।
बजट बनाम क्रियान्वयन: उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के बजट में बेसहारा गोवंश के रखरखाव के लिए हर साल सैकड़ों करोड़ रुपये आवंटित किए जाते हैं। प्रति गोवंश एक तय राशि (जैसे 30-50 रुपये प्रतिदिन) गौशाला संचालकों को दी जाती है, लेकिन भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही के कारण यह पैसा गाय के चारे तक नहीं पहुंच पाता।
नीतिगत विफलता: गोवंश संरक्षण के लिए जिस ‘समग्र पुनर्वास नीति’ (Holistic Rehabilitation Policy) की आवश्यकता थी, वह सिरे से गायब है। केवल वध रोकने के कानून बना देने से गाय का संरक्षण नहीं हो जाता, जब तक कि उनके भरण-पोषण का एक स्थायी और व्यावहारिक आर्थिक मॉडल न तैयार किया जाए।
आस्था के नाम पर वोट मांगना और राजनीति करना आसान है, लेकिन एक जीव के प्रति सच्ची संवेदनशीलता दिखाना कठिन। जब तक गोवंश संरक्षण को एक भावनात्मक या राजनीतिक मुद्दे से निकालकर एक व्यावहारिक प्रशासनिक और कृषि-अर्थशास्त्र की समस्या के रूप में नहीं देखा जाएगा, तब तक यह स्थिति नहीं सुधरेगी। ‘गौमाता’ के नाम पर राजनीति करने वाले दलों को यह समझना होगा कि गाय का असली सम्मान नारों में नहीं, बल्कि उन्हें सड़कों पर कचरा खाने और हादसों में मरने से बचाने में है।












