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Law and Order in UP: क्या सिर्फ कागजों और विज्ञापनों में सिमट गई है यूपी की कानून व्यवस्था? पढ़ें दावों और हकीकत का पूरा विश्लेषण

Mayank Gaur by Mayank Gaur
July 3, 2026
in उत्तर प्रदेश, प्रदेश खबरें
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Law and Order in UP: क्या सिर्फ कागजों और विज्ञापनों में सिमट गई है यूपी की कानून व्यवस्था? पढ़ें दावों और हकीकत का पूरा विश्लेषण
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Law and Order in UP: जब भी उत्तर प्रदेश (UP) की बात होती है, तो सबसे पहले ‘बुलडोजर’, ‘एनकाउंटर’ और ‘जीरो टॉलरेंस’ जैसे शब्द हमारे दिमाग में आते हैं। पिछले कुछ सालों में यूपी सरकार ने यह साबित करने की पूरी कोशिश की है कि प्रदेश अब अपराध मुक्त हो चुका है। सरकार अक्सर अपने 9 साल के कार्यकाल में हुए 277 से ज्यादा पुलिस एनकाउंटर और माफियाओं पर हुई कार्रवाई को अपनी सबसे बड़ी जीत बताती है।

लेकिन, जब हम टीवी और अखबारों के विज्ञापनों से बाहर निकलकर जमीनी हकीकत देखते हैं, तो कहानी कुछ और ही नजर आती है। अगर हम पुलिस के काम करने के तरीके, अदालतों की टिप्पणियों और एनसीआरबी (NCRB) के असली आंकड़ों का बारीकी से विश्लेषण करें, तो सुशासन के इन दावों में कई बड़े सुराख दिखाई देते हैं। आइए, एक दोस्त की तरह बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं कि यूपी की कानून व्यवस्था में कहां और क्या गड़बड़ियां हो रही हैं।

एनसीआरबी (NCRB) के आंकड़ों का पेंच: क्या कह रहे हैं असली नंबर?

अक्सर सरकार और पुलिस प्रशासन अपनी पीठ थपथपाने के लिए आंकड़ों का सहारा लेते हैं। हाल ही में पुलिस विभाग ने दावा किया कि 2024 की एनसीआरबी रिपोर्ट के अनुसार यूपी में अपराध दर 180.2 रही, जो राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। सुनने में यह बहुत अच्छा लगता है।

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लेकिन रुकिए, जब आप इसी रिपोर्ट को गहराई से पढ़ेंगे, तो एक चौंकाने वाला सच सामने आएगा। इसी रिपोर्ट के अनुसार, प्रति व्यक्ति अपराध दर (Per Capita Crime Rate) के मामले में उत्तर प्रदेश का आंकड़ा 7.4 है, जो कि देश में सबसे ज्यादा है। यह विरोधाभास सीधे तौर पर इस बात की तरफ इशारा करता है कि प्रदेश के ‘अपराध-मुक्त’ होने के दावों और असलियत में काफी अंतर है। कई बार थानों में सही तरीके से मामले ही दर्ज नहीं किए जाते, जिससे असली आंकड़े छिप जाते हैं।

महिला सुरक्षा के दावे और ‘1090’ हेल्पलाइन का सच

किसी भी सरकार की कानून व्यवस्था का सबसे बड़ा टेस्ट यह होता है कि वहां महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं। विपक्षी दल, खासकर समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव, लगातार यह आरोप लगाते रहे हैं कि यूपी महिलाओं के खिलाफ अपराधों में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला राज्य बन गया है।

अगर हम ‘जीरो टॉलरेंस’ की बात करें, तो रामपुर में एक छात्रा से सरेराह छेड़छाड़ और बस्ती जैसी जगहों से लगातार आ रही उत्पीड़न की खबरें दिल दहला देती हैं। सबसे दुखद बात यह है कि महिलाओं की तुरंत मदद के लिए बनाई गई ‘1090’ (विमेन पावर लाइन) जैसी शानदार व्यवस्था, जो कभी बहुत असरदार हुआ करती थी, आज बदहाली का शिकार है। जब हेल्पलाइन ही हांफ रही हो, तो आधी आबादी की सुरक्षा के दावों पर सवाल उठना लाजमी है।

जब हाईकोर्ट ने लगाई यूपी पुलिस को फटकार (क्या हैं खामियां?)

पुलिस का काम सिर्फ अपराधियों को पकड़ना नहीं, बल्कि सही और निष्पक्ष जांच करना भी है। लेकिन यूपी पुलिस की जांच के तरीकों पर खुद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है।

जनवरी 2026 में दिए गए एक फैसले में हाईकोर्ट ने यूपी पुलिस की जांच प्रणाली में ‘बार-बार होने वाली खामियों’ (Systemic Lapses) को उजागर किया था। अदालत ने सख्त लहजे में कहा था कि बच्चों से जुड़े गंभीर मामलों (POCSO Act) में पुलिस मेडिकल रिपोर्ट और उम्र के सुबूत सही तरीके से जुटाने में लगातार फेल हो रही है। इस लापरवाही का नतीजा यह होता है कि असली अपराधी तो बच निकलते हैं, लेकिन उम्र के फर्जी दावों के कारण कई निर्दोष लोग झूठे मुकदमों में फंस जाते हैं।

नया माफियाराज और ‘डिजिटल अरेस्ट’ की बढ़ती सुनामी

सरकार भले ही दावा करे कि माफिया खत्म हो गए हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अपराध का तरीका बदल गया है। आरोप है कि अब कई क्रिमिनल और ड्रग्स का धंधा करने वाले माफियाओं को राजनीतिक संरक्षण (Political Cover) मिल गया है। वे पुलिस की नाक के नीचे अपना काला धंधा चला रहे हैं और प्रशासन अक्सर मूकदर्शक बना रहता है।

इसके अलावा, आज का सबसे बड़ा खतरा ‘साइबर क्राइम’ है। एनसीआरबी 2024 की रिपोर्ट बताती है कि यूपी में साइबर अपराधों में 17% की भारी बढ़ोतरी हुई है। ठग अब सड़कों पर नहीं लूटते, बल्कि फोन पर ‘डिजिटल अरेस्ट’ (Digital Arrest) का डर दिखाकर, नकली पुलिस या सीबीआई अफसर बनकर लोगों की जिंदगी भर की कमाई लूट रहे हैं। पारंपरिक लाठी-डंडों वाली पुलिस आज की इस हाईटेक और डिजिटल क्राइम की लहर से निपटने में काफी संघर्ष कर रही है।

किसी भी राज्य की कानून व्यवस्था सिर्फ थानों का रंग-रोगन करने या एनकाउंटर के आंकड़े पेश करने से मजबूत नहीं होती। जब तक महिलाओं को रात में सड़क पर चलने में डर लगेगा, जब तक हाईकोर्ट पुलिस की जांच पर सवाल उठाता रहेगा, और जब तक आम आदमी को न्याय के लिए राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ेगा, तब तक कानून व्यवस्था के ये दावे सिर्फ ‘पॉलिटिकल पीआर’ (Political PR) ही माने जाएंगे। असली सुशासन वह है जहां आम आदमी को पुलिस से डर नहीं, बल्कि सुरक्षा का अहसास हो।


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