Geopolitics: अगर आप अंतरराष्ट्रीय राजनीति और भारत की सुरक्षा से जुड़ी खबरों में थोड़ी भी दिलचस्पी रखते हैं, तो आपको पता होगा कि हमारा पड़ोसी देश चीन (China) कभी शांत नहीं बैठता। उसकी हमेशा से यही कोशिश रहती है कि वह व्यापार के बहाने दुनिया भर के अहम समुद्री रास्तों पर अपना कब्जा जमा ले।
पाकिस्तान में ‘चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर’ (CPEC) बनाकर अरब सागर तक पहुंचने के बाद, अब ड्रैगन की नजरें हमारे बिल्कुल पड़ोस यानी बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) पर टिक गई हैं। इसके लिए चीन ने एक नया और बड़ा प्लान तैयार किया है, जिसमें वह म्यांमार और बांग्लादेश का इस्तेमाल करने जा रहा है। आइए, एक दोस्त की तरह बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं कि चीन का यह नया आर्थिक गलियारा (Economic Corridor) क्या है, बांग्लादेश की इसमें क्या भूमिका है और यह भारत की पूर्वी सीमाओं के लिए कितनी बड़ी टेंशन बन सकता है।
क्या है चीन का नया ‘मास्टरप्लान’? (कुनमिंग से मोंगला पोर्ट तक)
चीन अपने व्यापार को बढ़ाने के नाम पर दुनिया भर में सड़कें, रेल लाइनें और बंदरगाह (Ports) बना रहा है। गुरुवार (2 जुलाई) को चीन ने आधिकारिक तौर पर यह बताया है कि वह म्यांमार और बांग्लादेश के रास्ते एक नया और विशाल ‘आर्थिक गलियारा’ (Economic Corridor) बनाना चाहता है।
इस मास्टरप्लान के तहत, चीन अपने ‘कुनमिंग’ (Kunming) शहर को म्यांमार के रास्तों से होते हुए सीधे बांग्लादेश के ‘मोंगला पोर्ट’ (Mongla Port) और अन्य बड़े बंदरगाहों से जोड़ेगा। इसके लिए दोनों देशों के बीच सड़क, रेलवे और पोर्ट्स का एक पूरा नेटवर्क बिछाया जाएगा। चीन का कहना है कि वह इस प्रोजेक्ट में दूसरे देशों को भी शामिल होने की छूट देगा, लेकिन कूटनीति के जानकार मानते हैं कि यह एक तीर से दो निशाने लगाने की चीनी चाल है— पहला माल ढुलाई (Trade) आसान करना, और दूसरा बंगाल की खाड़ी में अपनी धाक जमाना।
CPEC पार्ट-2: अरब सागर के बाद अब बंगाल की खाड़ी पर नजर
अगर आप इस पूरे प्रोजेक्ट को ध्यान से देखेंगे, तो आपको यह बिल्कुल ‘चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर’ (CPEC) की फोटोकॉपी लगेगा। याद कीजिए, चीन ने पाकिस्तान में अरबों डॉलर खर्च करके ‘ग्वादर पोर्ट’ बनाया था, ताकि उसे आसानी से ‘अरब सागर’ (Arabian Sea) तक पहुंचने का रास्ता मिल जाए। अब ठीक उसी तर्ज पर, चीन बांग्लादेश और म्यांमार के इस नए कॉरिडोर के जरिए सीधे बंगाल की खाड़ी तक अपना नया और परमानेंट रूट बनाना चाहता है।
बांग्लादेश के पीएम का चीन दौरा और ‘2+2’ डायलॉग
यह सारा मामला तब और ज्यादा पुख्ता हो गया जब बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान (Tarique Rahman) हाल ही में अपनी पहली विदेश यात्रा पर चीन पहुंचे। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, पीएम तारिक रहमान और चीनी अधिकारियों के बीच इस बड़े प्रोजेक्ट को लेकर विस्तार से बातचीत हुई है।
इस बढ़ती दोस्ती का एक और सबूत गुरुवार (2 जुलाई) को देखने को मिला। बांग्लादेश में मौजूद चीनी राजदूत (Ambassador) याओ वेन ने पत्रकारों को एक बहुत अहम जानकारी दी। उन्होंने बताया कि चीन की राजधानी बीजिंग और ढाका के बीच कूटनीति (Diplomacy) और रक्षा (Defense) के मुद्दों पर ‘2+2 डायलॉग’ विकसित करने पर भी सहमति बन गई है। यह दिखाता है कि दोनों देश सिर्फ व्यापार ही नहीं, बल्कि रक्षा के मोर्चे पर भी करीब आ रहे हैं।
भारत के लिए यह प्रोजेक्ट क्यों है खतरे की घंटी?
अब सबसे बड़ा और अहम सवाल— अगर चीन, बांग्लादेश और म्यांमार कोई सड़क या पोर्ट बना रहे हैं, तो इससे भारत को क्या दिक्कत है? दिक्कत बहुत बड़ी है और इसे हमारे ‘डिफेंस एक्सपर्ट्स’ (रक्षा विशेषज्ञों) ने बहुत आसान शब्दों में समझाया है।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि शांतिकाल में तो बंदरगाह, रेल और सड़कों का इस्तेमाल व्यापार के लिए होता है। लेकिन, जब कभी युद्ध जैसे हालात बनते हैं, तो यही ‘ट्रेड रूट’ रातों-रात ‘मिलिट्री रूट’ में बदल जाते हैं। अगर चीन की पहुंच बंगाल की खाड़ी तक मजबूत हो जाती है, तो जरूरत पड़ने पर वह इसी कॉरिडोर का इस्तेमाल करके अपने टैंक, सैनिक, हथियार और सैन्य रसद बहुत तेजी से भारत की पूर्वी सीमा (Eastern Border) तक पहुंचा सकता है। यह भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीधा और बहुत बड़ा खतरा है।
कुल मिलाकर बात यह है कि चीन का यह नया ‘आर्थिक गलियारा’ सिर्फ बिजनेस का रास्ता नहीं है, बल्कि भारत को चारों तरफ से घेरने वाली उसकी ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (String of Pearls) रणनीति का एक और नया हिस्सा है। बांग्लादेश और म्यांमार के साथ चीन की बढ़ती रक्षा और कूटनीतिक नजदीकियां भारत सरकार के लिए एक बड़ा अलर्ट (Alert) है। अब देखना यह है कि भारतीय कूटनीति इस नई चुनौती से कैसे निपटती है और बंगाल की खाड़ी में अपने प्रभाव को कैसे बनाए रखती है।












