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UP Government Advertisement: यूपी सरकार के विज्ञापनों पर करोड़ों खर्च? अखबारों से डिजिटल मीडिया तक प्रचार

Priyanshi Singh by Priyanshi Singh
August 8, 2026
in राष्ट्रीय
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UP Government Advertisement: यूपी सरकार के विज्ञापनों पर करोड़ों खर्च? अखबारों से डिजिटल मीडिया तक प्रचार
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UP Government Advertisement: यूपी सरकार के विज्ञापन खर्च को लेकर सवाल उठ रहे हैं। रिपोर्ट और आरटीआई के मुताबिक अखबारों, वेबसाइटों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए।

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार के प्रचार-प्रसार को लेकर एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि राज्य सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों के प्रचार के लिए अखबारों, न्यूज वेबसाइटों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक बड़े पैमाने पर सरकारी विज्ञापन दिए जा रहे हैं। न्यूज़लॉन्ड्री की एक रिपोर्ट में प्रकाशित आंकड़ों के मुताबिक, सिर्फ अखबारों में ही जुलाई महीने के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार के दर्जनों विज्ञापन प्रकाशित हुए।

रिपोर्ट के अनुसार, सरकार का प्रचार अभियान केवल पारंपरिक मीडिया तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल मीडिया वेबसाइटों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक भी इसका विस्तार हुआ है। वहीं, अलग-अलग सरकारी विभाग अपने स्तर पर भी प्रचार के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं।

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29 दिनों में दैनिक जागरण में 54 सरकारी विज्ञापन

न्यूज़लॉन्ड्री के मुताबिक, जुलाई महीने के 29 दिनों में दैनिक जागरण के लखनऊ संस्करण में उत्तर प्रदेश सरकार के कुल 54 विज्ञापन प्रकाशित हुए।

इनमें तीन विज्ञापन पूरे पन्ने के थे, जबकि 32 विज्ञापन आधे पन्ने और 19 विज्ञापन एक-चौथाई पन्ने के थे।

इस हिसाब से देखा जाए तो जुलाई में लगभग हर दिन उत्तर प्रदेश सरकार का कम से कम एक से दो विज्ञापन अखबार में दिखाई दिए।

इसी अवधि में हिंदुस्तान के लखनऊ संस्करण में 49 सरकारी विज्ञापन प्रकाशित होने की बात रिपोर्ट में कही गई है। इनमें तीन पूरे पन्ने, 29 आधे पन्ने और 17 एक-चौथाई पन्ने के विज्ञापन शामिल थे।

इन आंकड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि राज्य सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के लिए प्रिंट मीडिया में कितना बड़ा विज्ञापन अभियान चलाया जा रहा है।

डिजिटल मीडिया पर भी करोड़ों का खर्च

सरकारी प्रचार का दायरा अखबारों तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश सरकार ने डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म पर भी बड़े पैमाने पर विज्ञापन जारी किए हैं।

न्यूज़लॉन्ड्री को मिली जानकारी के अनुसार, एशियानेट न्यूज़ डॉट कॉम को 30 दिनों के बैनर विज्ञापन के लिए 94.40 लाख रुपये का भुगतान किया गया।

यह विज्ञापन 14 मार्च 2026 से 30 दिनों तक वेबसाइट पर चलाया गया। इसमें ‘स्वावलंबन उद्यम’, ‘यूपी में महिला सक्षम है’ और ‘सुपरफास्ट रफ्तार’ जैसे संदेशों वाले बैनर शामिल थे।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इसी अवधि में वनइंडिया डॉट कॉम को भी 94.40 लाख रुपये का भुगतान किया गया।

यानी केवल इन दो डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए ही करीब 1.89 करोड़ रुपये के विज्ञापन भुगतान का उल्लेख रिपोर्ट में मिलता है।

अमर उजाला की वेबसाइट को 70.80 लाख रुपये

रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी 2026 में सूचना विभाग ने मिशन शक्ति और उज्ज्वला योजना के प्रचार के लिए अमर उजाला की वेबसाइट पर एक महीने के बैनर विज्ञापन का काम दिया था।

इसके लिए 70.80 लाख रुपये के भुगतान की जानकारी सामने आई है।

सरकारी विज्ञापनों का प्रसार सोशल मीडिया और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म तक भी पहुंच चुका है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से शेयरचैट जैसे प्लेटफॉर्म पर भी विज्ञापन दिए गए हैं।

सिर्फ सूचना विभाग ही नहीं करता विज्ञापन खर्च

सरकारी प्रचार के खर्च की तस्वीर इससे भी बड़ी हो सकती है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में केवल सूचना विभाग ही विज्ञापन जारी नहीं करता।

अलग-अलग विभाग अपने स्तर पर भी प्रचार और जनसंपर्क के लिए बजट खर्च करते हैं।

न्यूज़लॉन्ड्री को आरटीआई के जरिए मिली जानकारी के अनुसार, उद्योग एवं उद्यम प्रोत्साहन विभाग ने वित्तीय वर्ष 2024-25 और 2025-26 के बीच प्रचार-प्रसार पर करीब 60 करोड़ रुपये खर्च किए।

रिपोर्ट के अनुसार, इसमें लगभग 12 करोड़ रुपये प्रयागराज महाकुंभ के दौरान प्रचार पर खर्च किए गए।

ओडीओपी के प्रचार पर भी बड़ा खर्च

उत्तर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी वन डिस्ट्रिक्ट, वन प्रोडक्ट यानी ODOP योजना के प्रचार के लिए भी बड़े स्तर पर काम कराया गया।

न्यूज़लॉन्ड्री के पास मौजूद दस्तावेजों के मुताबिक, उद्योग एवं उद्यम प्रोत्साहन निदेशालय ने जुलाई 2025 में ‘योरस्टोरी’ वेबसाइट के साथ एक करार किया था।

इस करार के तहत करीब 70 लाख रुपये दिए जाने की बात सामने आई है।

इस प्रोजेक्ट में उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों के ओडीओपी उद्यमियों, कारीगरों और इनोवेटर्स की 100 से अधिक सफलता की कहानियां रिकॉर्ड कर प्रदर्शित करना शामिल था।

इसके अलावा स्थानीय विरासत, रोजगार, कारीगरों के सशक्तिकरण और ‘मेड इन यूपी’ ब्रांड के वैश्विक प्रभाव पर विजुअल वीडियो फिल्म तैयार करने की योजना भी इसमें शामिल थी।

प्रोजेक्ट के तहत सभी 75 जिलों की शिल्पकला, नवाचार और विरासत को दिखाने वाली 500 कॉफी टेबल बुक्स तैयार करने तथा क्षेत्रीय भाषाओं में रील्स और वीडियो फीचर बनाने का भी प्रावधान था।

सवाल यह नहीं कि सरकार प्रचार क्यों कर रही है, सवाल खर्च का है

सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों की जानकारी जनता तक पहुंचाना लोकतांत्रिक व्यवस्था में जरूरी है। सरकारी योजनाओं के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए विज्ञापन भी एक सामान्य माध्यम हैं।

लेकिन सवाल तब उठता है जब सरकारी प्रचार पर खर्च होने वाली रकम लगातार बढ़ती दिखाई दे और विज्ञापनों की मौजूदगी हर बड़े मीडिया प्लेटफॉर्म पर नजर आने लगे।

क्या सरकारी विज्ञापनों का उद्देश्य जनता को योजनाओं की जानकारी देना है या सरकार की राजनीतिक छवि को मजबूत करना?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी विज्ञापनों में इस्तेमाल होने वाला पैसा आखिरकार जनता के टैक्स से आता है।

सरकारी विज्ञापन और राजनीतिक प्रचार के बीच अंतर जरूरी

सरकारी विज्ञापन और राजनीतिक प्रचार के बीच एक स्पष्ट अंतर होना चाहिए। किसी योजना की जानकारी देना, उसके लाभार्थियों को जागरूक करना और सरकारी सेवाओं के बारे में सूचना देना जनहित का हिस्सा है।

लेकिन यदि सरकारी विज्ञापन लगातार सरकार की उपलब्धियों, नेतृत्व और राजनीतिक छवि को चमकाने का माध्यम बनते जाएं, तो सार्वजनिक धन के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में जहां शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, किसान, महंगाई और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े अनेक मुद्दे हैं, वहां यह बहस और महत्वपूर्ण हो जाती है कि सरकारी खजाने से प्रचार पर कितना पैसा खर्च किया जा रहा है और उसका वास्तविक लाभ जनता को कितना मिल रहा है।

जनता के पैसे का हिसाब जनता को मिलना चाहिए

सरकारी योजनाओं का प्रचार होना चाहिए, लेकिन उसके साथ खर्च का पारदर्शी हिसाब भी सार्वजनिक होना चाहिए।

किस मीडिया संस्थान को कितना विज्ञापन मिला? किस अभियान पर कितना पैसा खर्च हुआ? विज्ञापन देने का आधार क्या था? उसके परिणामों का मूल्यांकन कैसे किया गया? और क्या सरकारी प्रचार वास्तव में लक्षित लोगों तक पहुंचा?

इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए।

क्योंकि लोकतंत्र में सरकार जनता के पैसे से चलती है और जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उसके पैसे का इस्तेमाल विकास पर कितना और प्रचार पर कितना हो रहा है।

उत्तर प्रदेश में सरकारी विज्ञापनों पर सामने आए ये आंकड़े इसी बड़े सवाल को जन्म देते हैं—क्या विकास की जानकारी देने के नाम पर सरकारी प्रचार का दायरा जरूरत से ज्यादा बढ़ गया है?

अब जरूरत इस बात की है कि सरकार विज्ञापन खर्च को लेकर पूरी पारदर्शिता बरते और जनता को बताए कि करोड़ों रुपये के इस प्रचार अभियान से वास्तव में कितने लोगों तक सरकारी योजनाओं की जानकारी पहुंची और उसका क्या असर हुआ।

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Priyanshi Singh

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