Maharashtra Politics: महाराष्ट्र की राजनीति किसी सस्पेंस थ्रिलर फिल्म से कम नहीं है। यहाँ कब कौन सा नेता पाला बदल ले और कब सरकार गिर जाए, इसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल है। इन दिनों महाराष्ट्र के सियासी गलियारों में एक बार फिर भूचाल आने की सुगबुगाहट है। चर्चा है कि उद्धव बालासाहेब ठाकरे (UBT) की शिवसेना में एक और बड़ी टूट हो सकती है।
कहा जा रहा है कि एकनाथ शिंदे का गुट फिर से सक्रिय हो गया है और उद्धव के कई सांसद पाला बदलने की तैयारी में हैं। इन डराने वाली अटकलों के बीच, डैमेज कंट्रोल (नुकसान से बचने) के लिए उद्धव ठाकरे ने रविवार, 14 जून 2026 को अपने सभी 9 सांसदों की एक आपातकालीन बैठक बुलाई। आइए, एक पत्रकार दोस्त की तरह बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं कि इस बैठक के बंद कमरों में क्या हुआ, उद्धव ठाकरे का दर्द कैसे छलका और आने वाले दिनों में महाराष्ट्र की राजनीति किस करवट बैठने वाली है।
क्या है ‘ऑपरेशन टाइगर’ और टूट की अटकलें?
हाल ही में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के अंदर मची बगावत के बाद, अब महाराष्ट्र में भी ‘खेला’ होने की खबरें तेज हो गई हैं। राजनीतिक गलियारों में इस बात की पुरजोर चर्चा है कि उद्धव ठाकरे गुट के 9 लोकसभा सांसदों में से करीब 7 सांसद मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के संपर्क में हैं।
इस संभावित राजनीतिक उलटफेर को मीडिया और सियासी हलकों में ‘ऑपरेशन टाइगर’ का नाम दिया जा रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि आने वाले मानसून सत्र से पहले शिवसेना (यूबीटी) के कुछ सांसद और विधायक शिंदे गुट में शामिल होकर एक नई मुसीबत खड़ी कर सकते हैं।
14 जून की ‘मातोश्री’ बैठक: कौन आया, कौन नहीं?
अपनी पार्टी को बिखरने से बचाने और सांसदों का मन टटोलने के लिए उद्धव ठाकरे ने 14 जून को अपने आवास ‘मातोश्री’ पर एक अहम बैठक बुलाई।
इस बैठक के बाद एक नई अफवाह उड़ गई कि 9 में से 5 सांसद बैठक में आए ही नहीं। लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय राउत ने बाद में स्थिति साफ करते हुए बताया कि पार्टी के सभी 9 सांसद बैठक में शामिल हुए थे। फर्क सिर्फ इतना था कि 4 सांसद (अरविंद सावंत, अनिल देसाई, राजभाऊ वाजे और संजय पाटिल) व्यक्तिगत रूप से मातोश्री पहुंचे थे, जबकि बाकी 4 सांसद अपने-अपने क्षेत्रों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (ऑनलाइन) के जरिए जुड़े थे। एक सांसद से फोन पर बात हुई थी।
“आज मेरा नहीं, पर कल मेरा होगा”: उद्धव ठाकरे का दो टूक संदेश
इस बैठक में सबसे ज्यादा ध्यान उद्धव ठाकरे के भाषण ने खींचा। अपने सांसदों को संबोधित करते हुए उनका दर्द भी छलका और एक कड़ा संदेश भी सामने आया। पार्टी में संभावित टूट की खबरों पर चुप्पी तोड़ते हुए उद्धव ने बेहद साफ शब्दों में कहा, “अगर किसी को जाना है, तो वह खुशी-खुशी जाए।”
उन्होंने भावुक होते हुए कहा, “आज का दिन शायद मेरा न हो, लेकिन कल निश्चित रूप से मेरा होगा। तब तक हमें धैर्य रखना होगा और यह सब सहना होगा।”
उनका यह बयान बताता है कि वे अब किसी भी नेता के सामने हाथ जोड़ने या मिन्नतें करने के मूड में नहीं हैं। उन्होंने साफ कर दिया है कि जो लोग बालासाहेब ठाकरे की असली शिवसेना को छोड़कर गए हैं, उन्हें एक दिन अपने फैसले पर बहुत पछतावा होगा, लेकिन तब तक वापसी के सारे रास्ते बंद हो चुके होंगे।
4 साल पुरानी बगावत पर क्या बोले उद्धव?
बैठक के दौरान उद्धव ठाकरे ने 4 साल पहले (साल 2022) हुई उस बड़ी बगावत का भी जिक्र किया, जब एकनाथ शिंदे 40 विधायकों को लेकर अलग हो गए थे और उद्धव को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी थी।
उन्होंने कहा, “उस समय मैं राज्य का मुख्यमंत्री था। क्या लोगों को सच में ऐसा लगा कि जो बात पूरी दुनिया को दिखाई दे रही थी, उसका मुझे कोई अंदाजा नहीं था? मुझे सब आभास था कि क्या चल रहा है, लेकिन मैंने किसी पर दबाव नहीं डाला और न ही किसी के पुराने घोटालों की फाइलें खुलवाईं।”
उद्धव का तर्क बहुत सीधा है— अगर किसी ने मन ही बना लिया है कि उसे जाना है, तो उसे जबरदस्ती रोककर रखने का कोई फायदा नहीं है।
आगे क्या होगा? (संजय राउत का पलटवार)
बैठक खत्म होने के बाद मीडिया से बातचीत में शिवसेना (यूबीटी) के फायरब्रांड नेता संजय राउत ने एकनाथ शिंदे गुट के ‘ऑपरेशन टाइगर’ पर करारा तंज कसा। उन्होंने कहा, “आप किस ऑपरेशन टाइगर की बात कर रहे हैं? असली शेर तो हम हैं। अगर वे ‘ऑपरेशन टाइगर’ चलाएंगे, तो हम ‘ऑपरेशन भेड़िया’ (Operation Wolf) शुरू करेंगे। राउत ने दावा किया कि उनके सभी सांसद मजबूती से पार्टी के साथ खड़े हैं और कोई कहीं नहीं जा रहा है।
उद्धव ठाकरे की 14 जून की यह बैठक इस बात का साफ संकेत है कि वे अब डरी हुई या रक्षात्मक राजनीति नहीं करना चाहते। उन्होंने अपने सांसदों को यह संदेश दे दिया है कि संघर्ष का समय लंबा हो सकता है, लेकिन जो इस मुश्किल वक्त में टिकेगा, वही असली शिवसैनिक कहलाएगा। अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या शिंदे गुट सच में उद्धव के सांसदों को तोड़ने में कामयाब हो पाता है, या फिर मातोश्री की इस ‘इमोशनल और कड़क’ बैठक ने बगावत की आग को शांत कर दिया है।












