Global Economy: दुनिया भर की निगाहें इस वक्त अमेरिका और ईरान के बीच हो रही शांति डील (Peace Deal) पर टिकी हुई हैं। यह डील सिर्फ इन दो देशों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया और खासकर हमारी आपकी जेब के लिए बहुत मायने रखती है। इस समझौते का सबसे अहम हिस्सा है— ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) यानी होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलना।
दोनों देशों ने तय किया है कि डील पर हस्ताक्षर होते ही इस समुद्री रास्ते को खोलने का काम शुरू कर दिया जाएगा। सुनने में यह बहुत आसान लगता है कि दोनों देशों में सुलह हो गई और रास्ता खुल जाएगा। लेकिन जमीनी और ‘समुद्री’ हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। जानकारों का कहना है कि इस रास्ते को पूरी तरह से खोलने में कम से कम 30 दिन से लेकर 6 महीने तक का समय लग सकता है।
आखिर एक समुद्री रास्ते को खोलने में इतनी देरी क्यों लगेगी? आइए, एक दोस्त की तरह बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं पानी के नीचे बिछे उस ‘मौत के जाल’ की कहानी, जिसने दुनिया की टेंशन बढ़ा रखी है।
क्या है ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ और क्यों है यह इतना जरूरी?
सबसे पहले यह समझते हैं कि होर्मुज जलडमरूमध्य इतना अहम क्यों है। यह करीब 34 किलोमीटर चौड़ा एक समुद्री रास्ता है, जिसे फारस की खाड़ी (Persian Gulf) का प्रवेश द्वार कहा जाता है।
पूरी दुनिया में इस्तेमाल होने वाले तेल और गैस का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी 34 किलोमीटर चौड़े रास्ते से होकर गुजरता है। सऊदी अरब, यूएई, कुवैत और इराक जैसे देश अपना कच्चा तेल इसी रास्ते से दुनिया भर में भेजते हैं। अगर यह रास्ता बंद रहता है, तो दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छूने लगते हैं। इसलिए इस रास्ते का सुरक्षित खुलना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बहुत जरूरी है।
पानी के नीचे बिछा है 34 हजार किलो बारूद का जाल
अब आते हैं असली समस्या पर कि रास्ता खोलने में देरी क्यों होगी। दरअसल, जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध जैसे हालात बने हुए थे, तो ईरान ने अमेरिकी नौसेना (US Navy) के जंगी जहाजों को रोकने के लिए होर्मुज के समुद्री क्षेत्र में पानी के नीचे बड़ी संख्या में बारूदी सुरंगें (Mines) बिछा दी थीं।
अमेरिकी खुफिया अधिकारियों के हवाले से आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, होर्मुज के पानी के नीचे 100 से ज्यादा माइंस बिछी हुई हैं। इनमें से कई माइंस ‘माहम-3’ (Maham 3) प्रकार की हैं। एक ‘माहम-3’ माइन के अंदर करीब 340 किलो बारूद होता है।
अगर इसका गणित लगाएं, तो पानी के नीचे लगभग 34,000 किलो (34 टन) बारूद सेट किया गया है। रिपोर्ट बताती है कि हर एक मीटर पर एक किलो बारूद का जाल बिछाया गया है। अब खुद ईरान के लिए भी इन सुरंगों को सुरक्षित तरीके से हटाना कोई बच्चों का खेल नहीं है।
बारूदी सुरंगें हटाने में लगेगा कितना समय? (फ्रांस और ब्रिटेन का रोल)
ईरान ने आधिकारिक तौर पर अभी यह नहीं बताया है कि वह इन बारूदी सुरंगों को कैसे और कब तक हटाएगा। लेकिन इतना तय है कि इस काम में उसे बाहरी मदद की जरूरत पड़ेगी।
माना जा रहा है कि इस खतरनाक काम में फ्रांस और ब्रिटेन ईरान की मदद कर सकते हैं। हाल ही में इन दोनों देशों ने बारूदी सुरंगों का पता लगाने और उन्हें नष्ट करने वाले अपने खास जहाजों को साइप्रस की तरफ भेजा है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी अपने एक बयान में कहा था कि डील फाइनल होने के बाद होर्मुज के रास्ते को सुरक्षित करने में फ्रांस एक अहम भूमिका निभा सकता है।
जहां तक समय की बात है, तो जानकारों का मानना है कि इसमें कम से कम 30 दिन लगेंगे। वहीं, अमेरिकी रक्षा विभाग ‘पेंटागन’ का अनुमान है कि इतने भारी मात्रा में बिछाए गए बारूद को पूरी तरह साफ करने में 6 महीने तक का वक्त भी लग सकता है।
‘फ्री आवाजाही’ या पर्यावरण टैक्स? (डील के अंदर की सियासत)
सुरंगें हटाने के अलावा इस डील में पैसों को लेकर भी एक पेंच फंसा हुआ है। अमेरिका के उपराष्ट्रपति और वार्ता दल के प्रमुख जेडी वेंस (JD Vance) ने बताया है कि डील पर साइन होते ही ईरान इस रास्ते को खोलने के लिए राजी हो गया है और वह वहां से गुजरने वाले जहाजों से कोई ट्रांजिट फीस या पैसा नहीं लेगा।
लेकिन ईरान भी कच्चा खिलाड़ी नहीं है। वह इस रास्ते से पैसा कमाने का एक नया तरीका निकाल रहा है— ‘पर्यावरण टैक्स’ (Environmental Tax)। सूत्रों के मुताबिक, ईरान अपने पड़ोसी देश ओमान के साथ मिलकर एक नया प्रस्ताव तैयार कर रहा है। इसके तहत होर्मुज से गुजरने वाले कमर्शियल जहाजों से पर्यावरण को होने वाले नुकसान के नाम पर टैक्स वसूला जा सकता है।
कुल मिलाकर, अमेरिका और ईरान की यह डील पूरी दुनिया के लिए राहत की सांस लेकर आई है। लेकिन 34 हजार किलो बारूद से भरे होर्मुज जलडमरूमध्य को साफ करना इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती है। जब तक यह रास्ता पूरी तरह से साफ और सुरक्षित नहीं हो जाता, तब तक दुनिया के ऑयल मार्केट की धड़कनें तेज ही रहेंगी। अब देखना यह है कि फ्रांस और अन्य देशों की मदद से ईरान इस ‘खतरनाक मिशन’ को कितनी जल्दी पूरा कर पाता है।







