UP Politics: उत्तर प्रदेश की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का खेल कोई नई बात नहीं है। टीवी डिबेट्स से लेकर नुक्कड़ की चाय की दुकानों तक, नेता एक-दूसरे पर वार करते रहते हैं। लेकिन जब बात राजधानी लखनऊ (Lucknow) के विकास की आती है, तो आम जनता सिर्फ भाषण नहीं, बल्कि जमीन पर हुए काम का हिसाब मांगती है।
पिछले 9.5 सालों से उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार है। अगर आप ध्यान दें, तो इस सरकार का एक बहुत बड़ा समय पिछली समाजवादी पार्टी (SP) और विशेषकर अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) के कार्यकाल की कमियां गिनाने में बीता है। लेकिन इस ‘दोषारोपण की राजनीति’ के बीच एक बहुत ही जायज और बड़ा सवाल उठता है— क्या पिछली सरकार का विरोध करने के चक्कर में मौजूदा सरकार यह भूल गई कि उसे भी लखनऊ को कोई ऐतिहासिक और नया प्रोजेक्ट देना था? आइए, एक दोस्त की तरह लखनऊ के इंफ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा और सुविधाओं का जमीनी विश्लेषण करते हैं।
लखनऊ मेट्रो: विजन पुराना, सिर्फ फीता नया?
जब भी लखनऊ को जाम से मुक्ति दिलाने की बात आती है, तो ‘लखनऊ मेट्रो’ (Lucknow Metro) का नाम सबसे ऊपर आता है। हम सभी जानते हैं कि लखनऊ को एक आधुनिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम देने का यह सपना अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री रहते हुए जमीन पर उतरा था।
मेट्रो का शिलान्यास, सबसे मुश्किल नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर का निर्माण और इसके ट्रायल रन का बड़ा हिस्सा सपा सरकार के दौरान ही पूरा हो गया था।अब बात पिछले 9.5 सालों की:
मौजूदा सरकार ने मेट्रो के उन तैयार रूट्स का उद्घाटन जरूर किया, लेकिन क्या लखनऊ को कोई नया मेट्रो फेज मिला? जवाब है- नहीं। गोमती नगर और शहर के घनी आबादी वाले इलाकों को जोड़ने वाला ‘ईस्ट-वेस्ट कॉरिडोर’ (East-West Corridor) आज 9.5 साल बाद भी सिर्फ सरकारी फाइलों और डीपीआर (DPR) की मंजूरी के बीच झूल रहा है। सवाल यह है कि क्या पुरानी सरकार के शुरू किए गए काम का फीता काटना ही इकलौती उपलब्धि है?
पार्कों और पब्लिक स्पेस का अकाल: क्या लखनऊ को मिला कोई नया ‘सिग्नेचर प्रोजेक्ट’?
नवाबी शहर लखनऊ हमेशा से अपनी खूबसूरती और ऐतिहासिक पार्कों के लिए जाना जाता है। अखिलेश यादव के कार्यकाल में शहर को ‘जनेश्वर मिश्र पार्क’ (Janeshwar Mishra Park) मिला, जिसकी गिनती एशिया के सबसे बड़े पार्कों में होती है। इसके अलावा ‘गोमती रिवरफ्रंट’ (Gomti Riverfront) ने शहर को एक नई और विदेशी पहचान दी।
वर्तमान हकीकत:
बीजेपी के लगभग एक दशक लंबे शासन में लखनऊ को ऐसा कोई भी नया, विशाल और विश्वस्तरीय पार्क या पब्लिक स्पेस नहीं मिला, जिसे इस सरकार का अपना ‘सिग्नेचर प्रोजेक्ट’ कहा जा सके। गोमती रिवरफ्रंट को राजनीतिक जांच और भ्रष्टाचार के आरोपों का ऐसा अखाड़ा बना दिया गया कि आज वह शानदार प्रोजेक्ट अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। पुरानी चीजों की आलोचना करने के चक्कर में लखनऊ को कुछ नया नहीं मिल पाया।
शिक्षा और रोजगार: दावों और पेपर लीक की कड़वी हकीकत
लखनऊ को युवाओं और छात्रों का शहर कहा जाता है। सपा सरकार के दौरान छात्रों को मुफ्त लैपटॉप बांटकर ‘डिजिटल डिवाइड’ को कम करने का एक बहुत बड़ा और सफल प्रयास किया गया था। उस समय कई नए मेडिकल कॉलेज और यूनिवर्सिटीज की नींव भी रखी गई थी।
9.5 सालों का रिपोर्ट कार्ड:
अगर हम आज की बात करें तो शिक्षा और रोजगार के मोर्चे पर युवाओं में निराशा है।
पेपर लीक की मार: पिछले कुछ सालों में यूपी में लगातार पेपर लीक की घटनाएं हुई हैं (जैसे पुलिस भर्ती और आरओ/एआरओ)। इससे युवाओं का भविष्य अधर में लटक गया है।
कोई बड़ा संस्थान नहीं: लखनऊ में पिछले 9.5 सालों में कोई भी नई सेंट्रल यूनिवर्सिटी या अंतरराष्ट्रीय स्तर का शैक्षिक संस्थान स्थापित नहीं हुआ है।
सरकार ने छात्रों को स्मार्टफोन और टैबलेट बांटे जरूर हैं, लेकिन जब तक परीक्षा पारदर्शी नहीं होगी, तब तक इन गैजेट्स का युवा क्या करेंगे?
इकाना स्टेडियम और आईटी सिटी: सिर्फ नाम बदलने की राजनीति?
जब हम लखनऊ के गोमती नगर एक्सटेंशन की तरफ जाते हैं, तो शानदार इकाना स्टेडियम (Ekana Stadium) और आईटी सिटी (IT City) देखकर गर्व होता है। लेकिन हकीकत यह है कि ये इंफ्रास्ट्रक्चर भी पिछली सरकार की ही देन हैं। मौजूदा सरकार ने इकाना स्टेडियम का नाम बदलकर अटल बिहारी वाजपेयी जी के नाम पर जरूर कर दिया, लेकिन क्या शहर में कोई नया स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स या दूसरा बड़ा आईटी हब बनाया गया?
क्या बुरा था से आगे बढ़कर ‘क्या नया बना’ बताने का वक्त
एक मजबूत और स्वस्थ लोकतंत्र में पिछली सरकारों की गलतियों की समीक्षा और जांच बिल्कुल होनी चाहिए। इसमें कोई शक नहीं कि मौजूदा बीजेपी सरकार ने यूपी में कानून-व्यवस्था (Law and Order) को सुधारने के बड़े दावे किए हैं और कई जगह इसका असर दिखा भी है।
लेकिन, जब बात लखनऊ जैसे बड़े महानगर के ‘अर्बन डेवलपमेंट’ (शहरी विकास) की आती है, तो यह 9.5 साल का कार्यकाल थोड़ा खाली-खाली और निराशाजनक लगता है। अखिलेश यादव की योजनाओं में कमियां निकालना राजनीतिक मजबूरी हो सकती है, लेकिन लगभग 10 साल का समय किसी भी सरकार के लिए अपना खुद का एक ऐतिहासिक विकास मॉडल खड़ा करने के लिए बहुत होता है। राजनीति से परे हटकर, अब समय आ गया है कि सरकार ‘क्या बुरा था’ की रट छोड़कर यह बताए कि उसने राजधानी के लिए ‘नया और बेहतर क्या बनाया’।










