देशभर में ई-20 (E-20) ईंधन को लेकर उठ रही चिंताओं के बीच मोदी सरकार द्वारा की गई प्रेस ब्रीफिंग के बावजूद उपभोक्ताओं और विशेषज्ञों के कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब अब भी अनुत्तरित हैं। नई दिल्ली में पेट्रोलियम मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों, ऑटोमोबाइल उद्योग के प्रतिनिधियों और तेल विपणन कंपनियों (OMCs) ने 4 जुलाई 2026 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर इन चिंताओं को खारिज करने का प्रयास किया था। डैमेज कंट्रोल की इस कोशिश में सरकार ने ई-20 कार्यक्रम के आर्थिक लाभों को सामने रखा, लेकिन पुराने वाहनों की सुरक्षा, माइलेज में गिरावट, ईंधन की कीमत और भंडारण से जुड़े तकनीकी जोखिमों पर स्थिति स्पष्ट नहीं की।
यह प्रेस ब्रीफिंग ऐसे समय में बुलाई गई जब देश के विभिन्न हिस्सों में ई-20 ईंधन के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में चल रही एक सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई थी कि सरकार ने ई-20 को एक ‘प्रयोग’ (एक्सपेरिमेंट) बताया था, हालांकि सरकार अब इस दावे का खंडन कर रही है।
पुराने वाहनों की सुरक्षा और तकनीकी मानकों में दोहरा रवैया
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सरकार और ऑटोमोबाइल उद्योग के प्रतिनिधियों ने दावा किया कि साल 2023 से पहले बने ई-10 (E-10) अनुकूल वाहनों के लिए भी ई-20 पूरी तरह सुरक्षित है। मारुति सुजुकी का उदाहरण देते हुए कहा गया कि कंपनी ने ई-20 ईंधन के साथ 1.5 करोड़ पुराने वाहनों की सर्विसिंग की है और उनमें ईंधन संबंधी कोई समस्या नहीं आई।
हालांकि, मौजूदा सरकारी नियमों के अनुसार, अप्रैल 2023 के बाद निर्मित सभी वाहनों के लिए अलग से ई-20 प्रमाणन (E-20 certification) और इंजन ट्यूनिंग अनिवार्य की गई है। सवाल यह उठता है कि यदि ई-20 पुराने इंजनों के लिए पूरी तरह सुरक्षित है, तो नए वाहनों के लिए अलग तकनीकी मानक और निर्माण तंत्र में बदलाव की आवश्यकता क्यों पड़ी? विशेषज्ञों के अनुसार, एथेनॉल पुराने वाहनों के रबर सील, प्लास्टिक पुर्जों और फ्यूल लाइनों को नुकसान पहुंचाता है। नीति आयोग के अपने आंकड़े भी मानते हैं कि ई-10 के लिए डिजाइन किए गए वाहनों में ई-20 का उपयोग करने पर माइलेज में 1 से 2 प्रतिशत की कमी आती है।
एथेनॉल सस्ता होने के बावजूद उपभोक्ताओं को राहत क्यों नहीं?
तेल विपणन कंपनियां एथेनॉल की खरीद लगभग 58 रुपये से 72 रुपये प्रति लीटर की दर पर करती हैं, जबकि दिल्ली में पेट्रोल की खुदरा कीमत लगभग 102 रुपये प्रति लीटर है। जब ई-20 ईंधन में 20 प्रतिशत हिस्सा सस्ते एथेनॉल का है, तो इसकी कीमत सामान्य पेट्रोल के बराबर क्यों रखी गई है? कम लागत का लाभ उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंच रहा है।
ब्राजील जैसे देशों में, जहां फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों का व्यापक उपयोग होता है, अधिक एथेनॉल वाले ईंधन पर भारी सब्सिडी दी जाती है ताकि माइलेज में होने वाले नुकसान की भरपाई की जा सके। चूंकि एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता (Energy Density) शुद्ध पेट्रोल की तुलना में 30 प्रतिशत कम होती है, जिससे वाहनों का माइलेज घटता है। भारत में उपभोक्ताओं को कम माइलेज का नुकसान भी उठाना पड़ रहा है और वे कीमत भी सामान्य पेट्रोल जितनी ही चुका रहे हैं।
पानी की मिलावट का जोखिम और भूटान का इनकार
एथेनॉल की प्रकृति वातावरण से नमी को सोखने (Hygroscopic) की होती है, जिससे ‘फेज़ सेपरेशन’ (Phase Separation) का खतरा बढ़ जाता है। इसमें पानी और एथेनॉल पेट्रोल से अलग होकर ईंधन टैंक की तलहटी में जमा हो जाते हैं, जिससे इंजन में जंग और पुर्जों को नुकसान पहुंच सकता है।
भंडारण और नमी के इसी जोखिम के कारण भूटान ने आधिकारिक तौर पर भारतीय तेल विपणन कंपनियों (OMCs) के ई-20 ईंधन को लेने से इनकार कर दिया था और सामान्य पेट्रोल की आपूर्ति की मांग की थी। हालांकि प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) ने जंग लगने के दावों को खारिज किया है, लेकिन सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि देश के 90,000 पेट्रोल पंपों पर पानी की मिलावट रोकने के लिए क्या विशेष बुनियादी ढांचा विकसित किया गया है।
नीति आयोग की 2021 की रिपोर्ट और उपभोक्ताओं के अधिकार
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने नीति आयोग की 2021 की एक रिपोर्ट का हवाला दिया था, जिसमें ई-20 मिश्रित ईंधन से कारों की फ्यूल एफिशिएंसी में 6 से 7 प्रतिशत और दोपहिया वाहनों में 3 से 4 प्रतिशत की कमी आने का अनुमान जताया गया था। रिपोर्ट में पुराने वाहनों के लिए ई-10 पेट्रोल की उपलब्धता बनाए रखने की सिफारिश की गई थी। अब सवाल उठ रहे हैं कि इस मूल सलाह से जुड़े वेबपेज और दस्तावेजों को सार्वजनिक पहुंच से क्यों हटाया गया है।
इसके अलावा, उपभोक्ताओं के पास पेट्रोल पंपों पर ई-0 या ई-10 का विकल्प न होने से अपनी पसंद का ईंधन चुनने का अधिकार समाप्त हो गया है। सरकार ने अभी तक स्पष्ट नहीं किया है कि क्या ई-20 के कारण इंजन को होने वाले नुकसान को वाहन बीमा (इंस्योरेंस) कवर करेगा और क्या प्रभावित उपभोक्ताओं को किसी मुआवजे की व्यवस्था की जाएगी।
कृषि और पर्यावरण के नजरिए से देखें तो एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ना, धान और मक्का जैसी फसलों में सब्सिडी वाले यूरिया, डीएपी और भूजल का भारी उपयोग होता है। एक लीटर एथेनॉल के उत्पादन में गन्ने से 3,000 लीटर और चावल से 10,000 लीटर से अधिक पानी की खपत होती है। इस छिपी हुई पर्यावरणीय और कृषि सब्सिडी की लागत को शामिल किए बिना एथेनॉल कार्यक्रम को पूरी तरह बचत का सौदा बताना वास्तविक मूल्यांकन नहीं है।
FAQ:
Q1: ई-20 ईंधन क्या है और इसके इस्तेमाल से वाहनों के माइलेज पर क्या असर पड़ता है?
A1: ई-20 ईंधन पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल का मिश्रण है। एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता शुद्ध पेट्रोल की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत कम होती है, जिसके कारण वाहनों के माइलेज में गिरावट आती है। नीति आयोग के पूर्व अनुमानों के अनुसार, इससे माइलेज में 3 से 7 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।
Q2: भूटान ने भारत से मिलने वाले ई-20 ईंधन को लेने से क्यों मना कर दिया था?
A2: एथेनॉल वातावरण से नमी बहुत आसानी से सोखता है, जिससे पानी और एथेनॉल अलग होकर फ्यूल टैंक के नीचे जमा हो जाते हैं (फेज़ सेपरेशन)। इस नमी और इंजन में जंग लगने के तकनीकी जोखिम के कारण भूटान ने भारतीय तेल कंपनियों के ई-20 ईंधन को लेने से इनकार कर दिया था।
Q3: एथेनॉल पेट्रोल से सस्ता होने के बावजूद भारत में ई-20 ईंधन की कीमत सामान्य पेट्रोल के बराबर क्यों है?
A3: तेल विपणन कंपनियां एथेनॉल को करीब 58 से 72 रुपये प्रति लीटर में खरीदती हैं, जो पेट्रोल की खुदरा कीमत से काफी सस्ता है। इसके बावजूद सरकार ने ऐसी कोई मूल्य निर्धारण व्यवस्था स्पष्ट नहीं की है जिससे एथेनॉल की कम लागत का लाभ उपभोक्ताओं को मिल सके।













