Smartphone Camera: अगले 2-3 सालों में आपके स्मार्टफोन का कैमरा सेटअप पूरी तरह से बदला हुआ नजर आ सकता है। अभी हाई-क्वालिटी फोटोग्राफी के लिए जो बड़े और भारी कैमरा सेंसर इस्तेमाल हो रहे हैं, वो जल्द ही बीते जमाने की बात होने वाले हैं। दरअसल, जापान की Nagoya University के रिसर्चर्स ने एक नई तरह का ट्रांसपेरेंट ऑप्टिकल सेंसर तैयार किया है। यह न सिर्फ इमेज क्वालिटी को कई गुना बेहतर करेगा, बल्कि कैमरा सेंसर के साइज को भी काफी छोटा कर देगा। इसका सीधा मतलब है कि नए सेंसर की मदद से बेहतरीन फोटोग्राफी के लिए फोन में बड़े कैमरा बम्प की जरूरत नहीं होगी।
क्या हैं इस टेक्नोलॉजी के फायदे और क्या-क्या बदलेगा?
अगर इस नई टेक्नोलॉजी को सफलतापूर्वक कमर्शियलाइज किया जाता है, तो इसके कई क्रांतिकारी फायदे देखने को मिलेंगे:
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स्लिम स्मार्टफोन: फोन के कैमरे और भी पतले और छोटे हो सकते हैं, जिससे स्मार्टफोन का डिजाइन ज्यादा स्लीक होगा।
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मैन्युफैक्चरिंग में आसानी: रिसर्चर्स के अनुसार, इस तकनीक की मदद से कैमरा सेंसर बनाने का प्रोसेस काफी आसान हो जाएगा।
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हर मौसम और स्थिति में दमदार: इस नए सेंसर ने 400 डिग्री सेल्सियस के अत्यधिक तापमान पर भी स्टेबल परफॉर्मेंस दी है। इसके अलावा, वैक्यूम और अत्यधिक नमी (Humid Environment) में भी इसने बिल्कुल सही तरीके से काम किया है।
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कई सेक्टर्स में होगा इस्तेमाल: इन फायदों को देखते हुए कहा जा सकता है कि ये सेंसर सिर्फ स्मार्टफोन ही नहीं, बल्कि ऑटोमोटिव, एयरोस्पेस, मेडिकल एंडोस्कोप, इंडस्ट्रियल इमेजिंग सिस्टम और यहां तक कि स्पेस हार्डवेयर में भी बड़े बदलाव ला सकता है।
कैसे काम करते हैं मौजूदा कैमरा सेंसर?
आजकल इस्तेमाल होने वाले मॉडर्न इमेज सेंसर में हर पिक्सल रेड (Red), ग्रीन (Green) और ब्लू (Blue) में से केवल एक ही कलर को कैप्चर करता है। इसके बाद, उसके आसपास के पिक्सल की जानकारी (Information) को प्रोसेस करके एक फुल-कलर इमेज बनाई जाती है।
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इस पूरी प्रोसेस में लाखों की संख्या में कलर फिल्टर की जरूरत पड़ती है।
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इस तकनीक की सबसे बड़ी खामी यह है कि इसमें पूरी इमेज डिटेल्स को 100% सटीकता के साथ कैप्चर नहीं किया जा सकता।
कैसे काम करेंगे ये नए ट्रांसपेरेंट ऑप्टिकल सेंसर?
Nagoya University के रिसर्चर्स ने इमेज सेंसर बनाने का यह एक बिल्कुल नया और इनोवेटिव तरीका खोजा है:
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GZO नैनोशीट का उपयोग: नए सेंसर में ट्रांसपेरेंट ‘GZO नैनोशीट’ का इस्तेमाल किया गया है। इस पर एक साथ कई लाइट-डिटेक्टिंग लेयर (परतें) लगाई जा सकती हैं।
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एक ही पिक्सल में सब कुछ: इनमें से हर लेयर विजिबल लाइट की वेवलेंग्थ के हिसाब से अलग-अलग रिस्पॉन्स देती है। इससे एक ही पिक्सल पूरी RGB इंफोर्मेशन को कैप्चर कर लेता है।
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75% कम पिक्सल में भी फुल रेजॉल्यूशन: इस तकनीक से कुल पिक्सल की जरूरत 75 प्रतिशत तक कम हो जाती है। सबसे खास बात यह है कि पिक्सल कम होने के बावजूद इमेज के रेजॉल्यूशन पर कोई नेगेटिव असर नहीं पड़ता है।
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इंसानी आंख की तरह काम: रिसर्चर्स का कहना है कि यह नया सेंसर बिल्कुल इंसान की आंख के रेटिना (Retina) की तरह काम करता है, जो दिमाग के एक पूरी इमेज बनाने से पहले ही कलर इंफोर्मेशन को अलग-अलग कर देता है।













