Jantar Mantar Protest: दिल्ली का जंतर-मंतर सिर्फ एक ऐतिहासिक जगह नहीं है, बल्कि यह हमारे देश के लोकतंत्र की वो धड़कन है, जहां से बदलाव की आवाजें उठती हैं। आज से करीब 15 साल पहले इसी जगह से ‘अन्ना आंदोलन’ की शुरुआत हुई थी, जिसने देश की राजनीति की तस्वीर बदल कर रख दी थी। आज, साल 2026 में, एक बार फिर जंतर-मंतर उसी तरह के एक बड़े जन-आंदोलन का गवाह बन रहा है।
फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार मुद्दा भ्रष्टाचार (करप्शन) का नहीं, बल्कि देश के लाखों युवाओं के भविष्य और शिक्षा तंत्र (Education System) का है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) और मशहूर शिक्षाविद् सोनम वांगचुक के नेतृत्व में हो रहे इस प्रदर्शन की तुलना अब राजनीतिक जानकार 2011 के अन्ना आंदोलन से कर रहे हैं। आइए, एक दोस्त की तरह बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं कि ये नया आंदोलन अन्ना आंदोलन से कितना अलग है, सरकार और मीडिया का रवैया कैसे बदल गया है, और इस पूरे विवाद की असली जड़ क्या है।
क्या है पूरा मामला और क्यों हो रहा है प्रदर्शन?
अगर आप इस खबर से अनजान हैं, तो आपको बता दें कि यह पूरा विवाद ‘नीट-यूजी’ (NEET-UG) परीक्षा में हुई कथित धांधली और पेपर लीक से जुड़ा है।
देशभर के छात्र और युवा इस बात से नाराज हैं कि उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ हुआ है। इसी को लेकर इंटरनेट पर बनी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) ने जंतर-मंतर पर डेरा डाल दिया। उनकी सबसे बड़ी मांग है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अपने पद से इस्तीफा दें।
इस छात्र आंदोलन को तब और ज्यादा ताकत मिल गई जब 28 जून को देश के जाने-माने वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) भी इसमें शामिल हो गए और उन्होंने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी।
2011 का अन्ना आंदोलन बनाम 2026 का छात्र आंदोलन: क्या है फर्क?
देखने में दोनों आंदोलन एक जैसे लग सकते हैं— भीड़ है, एक बुजुर्ग अनशन पर बैठा है, और सरकार के खिलाफ गुस्सा है। लेकिन वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है:
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रिस्क और खतरा: वरिष्ठ विश्लेषक योगेंद्र यादव बताते हैं कि 2011 के अन्ना आंदोलन में लोगों के लिए कोई ‘रिस्क’ नहीं था। लोग अपने बच्चों के साथ वहां एक पिकनिक की तरह जाते थे। लेकिन आज जो युवा जंतर-मंतर आ रहे हैं, वे अपनी नौकरी, करियर और पुलिस की लाठियों का बहुत बड़ा रिस्क लेकर आ रहे हैं।
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संगठन की ताकत: पत्रकार शरद गुप्ता के मुताबिक, अन्ना आंदोलन के पीछे एक बहुत मजबूत और सेटल संगठन था। लेकिन CJP का जन्म इंटरनेट पर एक मजाक (Meme) की तरह हुआ था, जो आज बिना किसी बड़े राजनीतिक संगठन के अन्ना आंदोलन से भी ज्यादा बड़ा और स्वतःस्फूर्त (Self-driven) आंदोलन बन चुका है।
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महिलाओं की भागीदारी: इस बार के आंदोलन में युवतियों और महिलाओं की भागीदारी पिछली बार के मुकाबले कहीं ज्यादा देखी जा रही है। यह भारत के इतिहास में पहली बार है जब ‘शिक्षा’ के मुद्दे पर इतनी बड़ी भीड़ बिना किसी स्वार्थ के सड़क पर उतरी है।
सरकार का रवैया: तब ‘बातचीत’ और अब ‘लाठीचार्ज’
किसी भी आंदोलन को डील करने में उस समय की सरकार का रवैया बहुत मायने रखता है।
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2011 में क्या हुआ था: जब अन्ना हजारे अनशन पर बैठे थे, तो तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने पहले दिन से ही उनसे बातचीत का रास्ता खुला रखा था। सरकार के मंत्री खुद धरना स्थल पर आकर अरविंद केजरीवाल और अन्ना हजारे से बात करते थे।
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आज क्या हो रहा है: विश्लेषकों का कहना है कि आज की सरकार ने पहले तो इस आंदोलन को पूरी तरह नजरअंदाज (Ignore) किया। जब भीड़ बढ़ने लगी, तो 20 जुलाई के ‘संसद मार्च’ के दौरान छात्रों पर लाठीचार्ज किया गया। इसके अलावा, आंदोलनकारियों की फंडिंग और बैकग्राउंड पर सवाल उठाकर उन्हें ‘बदनाम’ करने की कोशिश भी की जा रही है।
मीडिया की बदलती भूमिका: तब और अब में जमीन-आसमान का अंतर
इस पूरे घटनाक्रम में अगर किसी चीज की सबसे ज्यादा आलोचना हो रही है, तो वह है देश का ‘मेनस्ट्रीम मीडिया’ (टीवी चैनल्स)।
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पत्रकारों का कहना है कि 2011 में मीडिया पूरी तरह से अन्ना आंदोलन का हिस्सा बन गया था। टीवी पर 24 घंटे सिर्फ अन्ना आंदोलन चलता था और मीडिया सत्ता से तीखे सवाल पूछता था।
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लेकिन आज का नजारा बिल्कुल अलग है। आज मेनस्ट्रीम मीडिया पुलिस के बैरिकेड्स के पीछे खड़ा नजर आता है। वे सरकार से सवाल पूछने के बजाय आंदोलन कर रहे छात्रों से ही सवाल पूछ रहे हैं।
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हालांकि, इस कमी को आज के ‘यूट्यूबर्स’ (YouTubers) और स्वतंत्र पत्रकार पूरा कर रहे हैं। वे भीड़ के बीच जाकर जमीनी हकीकत दिखा रहे हैं, जिससे सोशल मीडिया के जरिए इस आंदोलन को करोड़ों लोगों का समर्थन मिल रहा है।











